Home | Contact
  My Profile
  Aired News
  Contact
  News/Articles


Loading...


News / Articles



Tolerating the traitors

I fail to understand what has happened to the people of India? Our sensitivity has totally vanished now. And let us understand this clearly that the society which loses its sense of nationalism collapses within no time. We are already witnessing the fast decay of the Indian society. The (mis)happening in Maharashtra, in Kashmir, in states of north-east or for that matter in any other state, is occurring only due to the lack of a sense of patriotism. The condition of a nation, where honour of nationalism has no place; where the Constitution is ruined and the threads which tie the nation together are criminally broken; can very well be imagined...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

इस मौन को धिक्कार है...

मैं यह समझ पाने में असमर्थ हूं कि आखिर भारतवर्ष के लोगों को हो क्या गया है? हमारी संवेदनशीलता कहां खो गई है? आप निश्चित मानिए कि जो भी समाज राष्ट्रीयता की भावना से रिक्त हुआ, उसका विनाश तय है। भारतीय समाज का तेजी से होता हुआ विघटन आप देख ही रहे हैं। महाराष्ट्र, कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्य या जिन भी राज्यों में विघटन की जो वीभत्स घटनाएं हो रही हैं, देशभक्त की हीनता के कारण ही तो हो रही हैं। जिस देश में राष्ट्रीयता का कोई स्थान न हो, जहां संविधान हर दिन कुचला जाता हो, जहां देश को एकसूत्र में बांधे रखने वाला धागा क्षत-विक्षत किया जाता हो, उस भारत देश की विडंबनाओं के बारे में यदि आप सोच नहीं पा रहे तो धिक्कार है...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

But what about masks!

Supreme Court did not mention anything on the masks covering the ugly real faces of politicians in India when passing an order to prohibit photographs of burqa-clad voters on their identity cards. The Supreme Court categorically said that a woman can't vote clad in burqa as it would hamper the identification of the voter. The apex court comprising Chief Justice K G Balakrishnan himself and Justice Deepak Verma rightly said that if sentiments are so strong and a woman does not want to be seen by any member of the public or by the officers and employees of the election commission, then she should not go to vote, as it is creating serious complications in identification of voters...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

अपने चेहरे से हम नकाब तो हटाएं...

वोट डालते समय मतदाता के चेहरे पर बुर्का रहे या नहीं, इस पर फैसला देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ-सुथरे नकाब ओढ़े देश के राजनीतिकों के बारे में कुछ भी नहीं कहा। सुप्रीमकोर्ट ने यह जरूर साफ-साफ कहा कि भारतीय लोकतंत्र में कोई भी मतदाता बुर्का पहन कर वोट नहीं डाल सकती, क्योंकि इससे महिला मतदाता की पहचान की प्रक्रिया बाधित होती है। लिहाजा मतदाता पहचान पत्र पर फोटो लगाने से लेकर वोट डालने तक महिला मतदाता का चेहरा बुर्के से ढंका नहीं रहेगा। यह निर्णायक फैसला जारी करते हुए देश के सर्वोच्च न्यायाधीश केजी बालकृष्णन और न्यायाधीश दीपक वर्मा ने ठीक ही कहा कि यदि भावना अत्यधिक प्रबल हो तो उस महिला को वोट डालने ही नहीं जाना चाहिए जिसे लोगों के सामने या मतदान कर्मियों के सामने अपना चेहरा दिखाने पर आपत्ति हो...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

Cracks in red corridor

There is a chasm between the Maoists in India and their Nepali counterparts. They have broken away from each other. So, while the rift might have damaged the Naxals, it has come as a great advantage to the Central Government which is fighting the Maoist outfits. Also, this rift has drawn a line of division among the outfits associated with the ultra Left movement at international level. Italy's Communist Party Nuovo Partito Comunista Italiano (NPCI) has extended its support to the 'line' of the Indian Maoists. This new development has triggered a rift in the Communist Party of Nepal (Maoists). The differences between Indian Maoists and their Nepali counterparts have created cracks in the efforts of Maoists to establish a 'Red Corridor' from Andhra Pradesh to Nepal via Uttar Pradesh, Maharashtra, Chhattisgarh, Madhya Pradesh, Orissa and Bihar...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

लाल दरार

भारत और नेपाल के माओवादियों के बीच विभाजन हो गया है। दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए हैं। नक्सल आंदोलन से जुड़े संगठनों केलिए यह फूट भले ही नुकसानदायक साबित हो रही हो, पर नक्सलियों से निपटने में लगी केंद्र सरकार के लिए यह फायदेमंद साबित हो रही हैं। इतना ही नहीं, इस अलगाव से विश्व स्तर पर अति-वामपंथी आंदोलन से जुड़े संगठनों में भी साफ-साफ विभाजन रेखा खिंच रही है। इटली की कम्युनिस्ट पार्टी ‘एनपीसीआई’ ने भारतीय माओवादियों की ‘लाइन’ को अपना समर्थन भी दे दिया है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के अंदर से भी दरकने की आवाजें आने लगी हैं। भारतीय माओवादियों और नेपाली माओवादियों के बीच हुए इस अलगाव से आंध्रप्रदेश के तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश होते हुए नेपाल तक ‘माओवादी गलियारा’ स्थापित करने के नक्सली प्रयासों को ब्रेक लग गया है। गृह मंत्रालय में नक्सल मामले देखने वाले एक आला अधिकारी भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की ‘उत्साही’ नेपाल यात्रा के पीछे इस अंदरूनी किन्तु बड़े ‘डेवलपमेंट’ को बड़ी वजह बताते हैं। माओवादियों के हथियार डालने के नेपाली फार्मूले को अख्तियार करने की भारतीय कोशिशें औपचारिक शक्ल ले पाएं इस पर भी प्रशासनिक-राजनीतिक-कूटनीतिक जद्‌दोजहद जारी है...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

The Public of the Republic

There was a disturbing news item in the newspapers a few days ago that said the central government was contemplating capital punishment for plane hijacking. From surrendering before the plane hijackers and the shameful release of notorious militants, to the contemptuous delay in execution of Afzal Guru awarded death penalty by the Supreme Court, our nation is fast descending into an abyss under the ill-leadership of the vote-players. Despite having completed 63 years of independence and 60 years as a Republic, we show signs of being immature and puerile...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

गणतंत्र या षडयंत्र

अखबारों में प्रकाशित एक खबर देख कर सुबह-सुबह मन आक्रोश से भर गया। खबर थी कि विमान अपहरण करने वालों के खिलाफ केंद्र सरकार फांसी की सख्त सजा का प्रावधान करने जा रही है। सत्ता सियासतदानों को वोट की राजनीति से फुर्सत मिले तो देशहित समझ में आए। इन्हीं झंडाबरदारों के नेतृत्व में अपना देश विमान अपहरण करने वालों के आगे नतमस्तक होकर जेल में बंद कुख्यात आतंकियों को कंधार ले जाकर छोड़ आने से लेकर संसद पर हमला करने वाले आतंकी को दामाद बनाए रखने तक की सतत स्खलन-यात्रा पर अग्रसर है। भारत की आजादी के 63 साल और भारतीय गणतंत्र के 60 साल हो चुके पर अपनी आजादी और अपनी गणतंत्रता नाबालिग ही रह गई...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

Sitting on a powder keg

Security agencies the world over are keeping an eye on two dreaded terrorists - Abdul Rahim alias Richard Reid and Dawood Gilani alias David Headley. Both Reid and Headley are cooling their heels in high security US jails. Headley's arrest has not only brought to light his role in Mumbai terror attack, it has also raised a few questions: How and why was he arrested? What other facts, besides his role in Mumbai attack, has he revealed? Why was the Indian intelligence agency not allowed to quiz Headley?
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

निशाने पर ठिकाने

अब्दुल रहीम उर्फ तारिक रज़ा उर्फ रिचर्ड रीड और दाऊद गिलानी उर्फ डेविड कोलमैन हेडली, ये दो ऐसे नाम हैं जिन पर दुनियाभर के जासूसों की निगाह लगी हुई है। हेडली के अभी हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी के हाथों पकड़े जाने और मुंबई हमले की साजिश में उसके शामिल रहने की खबरें सुर्खियों में आईं। रिचर्ड रीड पहले से अमेरिका की शीर्ष सुरक्षा वाली जेल में बंद है। डेविड कोलमैन हेडली कैसे और क्यों पकड़ा गया? हेडली ने मुंबई हमले के अलावा और कौन-कौन से खास सुराग दिए? हेडली से भारतीय खुफिया एजेंसियों को पूछताछ के लिए क्यों रोक दिया गया? ऐसी क्या खास ‘पोल’ है जिसके खुल जाने का डर अमेरिका को सता रहा है? भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ अमेरिकी खुफिया एजेंसी से लगातार ‘टच’ में है। रीड और हेडली से मिल रहे सुरागों के बारे में सीआईए के जरिए रॉ को जो कुछ सूचनाएं मिल रही हैं बहुत काम की हैं और चौंकाने वाली हैं। खास तौर पर भारत के परमाणु संस्थानों पर खतरे और पाकिस्तान के परमाणु व रासायनिक संस्थानों पर अल कायदा के मजबूत होते शिकंजे के बारे में...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

'Paa' sinks Samajwadi Party

In the words of Amar Singh, the erstwhile general secretary of Samajwadi Party, the overconfidence of its chief Mulayam Singh Yadav is to be blamed for the party's decline. One major symbol of this over-confidence was the defeat of Mulayam's daughter-in-law Dimple Yadav at the hands of former Samajwadi -turned Congressman Raj Babbar in the Ferozabad Lok Sabha by-election. The Congress strategy in Ferozabad was such that the Samajwadi party could not even guess what was coming its way. To add to its agony was the antics of the dissidents within the Samajwadi party - and the debacle was complete. Now the situation is such that even the Yadav family's stranglehold over the party has failed to do any good to its prospects, and the enigmatic Amar Singh - who nurtured the dynastic control over the party - is now making a show of distancing himself from it...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

‘पा’ ने डुबो दी सपा

अमर सिंह की भाषा में ही बात शुरू करें तो समाजवादी पार्टी का स्खलन मुलायम सिंह यादव के अतिरिक्त-आत्मविश्वास के कारण हो रहा है। दो अति-आत्मविश्वासों में पूरी पार्टी पिस रही थी और अब बिखर रही है। फिरोजाबाद उप चुनाव में राज बब्बर के जीतने और डिंपल यादव के हारने के बाद दो अति-आत्मविश्वासों का जो फिसड्‌डी नतीजा सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त हुआ उसने पार्टी की खोखली होती असलियत देश भर में उजागर कर रख दी। फिरोजाबाद चुनाव में कांग्रेस ने क्या रणनीति बनाई, बसपा ने कांग्रेस के साथ मिल कर क्या चौपड़ बिछाई और समाजवादी पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने कैसी बिजली गिराई कि समाजवादी पार्टी का अति-परिवारवाद ठीक से सांस भी नहीं ले पा रहा, पर अमर सिंह के खिलाफ गरम सांसें जरूर छोड़ रहा है। सपा के परिवारवाद को हवा देकर अपना हित साधते रहने वाले अमर सिंह भी अब उसे ‘छोड़ गए बालम, हाय अकेला छोड़ गए’...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

Raising the flag for truth

Those who always walked against the line or who always revolted against the mob crawling on the rotten path, why did they choose ‘By- Line’ as the name of this magazine? Everyone knows that ‘by-line’ is the lifeline of a reporter, when his name goes with his story; it is a reward in itself for all the effort. For this magazine, this title is not a decision taken by chance. Rather, it is a well planned and well-conceived thought-product. Here comes to mind a doha of saint-poet Kabir: Na Main janu sewa bandagi, Na main ghant bajai / Na main moorat dhari singhasan, Na main puhup chadhai / kiriya karam achar main chchada, chchada teertha nahana / sagri duniya bhai sayani, main hi ik baurana… (I do not know flattery or to yank the temple bell / I do not wish to get a throne or to festoon the throne / I left behind all the orthodoxies and holy baths / the whole world became sensible, only I remained mad)...
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

एक मुनादी सच की

हमेशा लीक से हट कर चलने वाले या ऐसे कहें कि लीक पर घिसटते लोगों के खिलाफ हमेशा बगावत कर अपनी अलग धार स्थापित करने की छटपटाहट से भरे लोगों ने लीक पर चलने जैसा नाम क्यों चुना... ‘बाई-लाइन’...?
‘बाई-लाइन’, अखबार के लोगों के लिए उनकी जिंदगी से जुड़ा नाम है। रिपोर्ट के साथ रिपोर्टर का नाम छपना बाई-लाइन है। वैसे, बाई-लाइन का शाब्दिक अर्थ आप सब समझते हैं। ‘बाई-लाइन’ पत्रिका का नाम, महज नाम प्राप्त करने की औपचारिक धुप्पलबाजी का परिणाम नहीं है बल्कि यह नाम एक लंबी विचार-प्रक्रिया का सुविचारित-उत्पाद है। कबीर का एक दोहा है, आपको याद ही होगा... ‘ना मैं जानूं सेवा बंदगी, ना मैं घंट बजाई / ना मैं मूरत धरि सिंहासन, ना मैं पुहुप चढ़ाई / किरिया करम अचार मैं छाड़ा, छाड़ा तीर्थ नहाना / सगरी दुनिया भई सयानी, मैं ही इक बौराना...’
Read More...

खबरें @ बाई-लाईन |

वह आवाज और आज के रीढ़हीन संपादकों की म्याऊं म्याऊं...

...अभी नहीं मरूंगा मैं, कभी नहीं मरूंगा मैं... फील्ड मार्शल मानिक शॉ के निधन पर लेख लिखते समय नीरज की कविता की यह पंक्ति याद आ गई थी। पत्रकारीय विधा के योद्धा आदरणीय प्रभाष जोशी जी के दिवंगत होने पर आज उन्हीं पंक्तियों से शुरुआत करता हुआ लिख रहा हूं... 'मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा'... और तेरा ही तुझको सौंप रहा हूं...

अग्रज आलोक तोमर जी और अनुज यशंवत जी के अनुभव और संस्मरणों ने जिंदगी के कैनवस पर बनते मिटते अनगिनत स्मृति रंगों को एक बार फिर जैसे साकार कर दिया हो।


1989 की बात है। मैं दिल्ली आया था। जोशी जी से मिलने जनसत्ता दफ्तर गया। तब इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर बहादुर शाह जफर मार्ग पर हुआ करता था। उस समय जोशी जी के स्टेनो कोई रामबाबू जी हुआ करते थे... तो रामबाबू जी ने मुझे उनके कक्ष में जाने से रोक दिया और कहा कि जोशी जी व्यस्त हैं। मैं सामने बैठा ऊबता रहा। इस बीच मैं हर दस पंद्रह मिनट पर रामबाबू के पास जाकर खड़ा हो जाता और वही डायलॉग सुनता, जोशी जी व्यस्त हैं, क्या टाइम लिया था..? घंटे भर से ज्यादा हो गया। अब रामबाबू से वही संवाद सुनना मुझे गवारा नहीं था और मैं धड़धड़ाता हुआ अंदर... और घबराए से रामबाबू भी अंदर...। अंदर कक्ष में तो अंधेरा था पर टेबुल लैंप जल रहा था। जोशी जी चश्मा लगाए कुछ लिखने में मगन थे। अचानक धड़ाम मचने पर उन्होंने मेरी तरफ देखा और मैंने फौरन दागा... यह व्यक्ति एक घंटे से मुझे अंदर नहीं आने दे रहा है... प्रभाष जी ने मुझे सामने कुर्सी पर बैठने का संकेत दिया और कहा, 'मैं विशेष संपादकीय लिख रहा हूं, राम बाबू जी को मैंने ही कहा था कि अभी मुझे कोई डिस्टर्ब न करे'...। मैंने उन्हें डिस्टर्ब कर दिया था लेकिन जोशी जी का विशाल व्यक्तित्व और उनकी सदाशयता...


Read More...

News on the News |

बुतों के आगे नतमस्तक जिंदा कौमें

उत्तर प्रदेश में मायावती के बुतों और स्मारकों का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के कारण मायावती को मिली कई न्यायिक सुविधाओं-संरक्षण की 'समृद्ध' पृष्ठभूमि के बरक्स बुतों-स्मारकों के प्रसंग में सख्त रवैया अख्तियार कर न्यायिक-उम्मीदों में फिर से थोड़ी सी जान फूंकी है... लखनऊ में जिस दिन मायावती ने अपनी ही मूर्ति का अनावरण किया था और बाबा अंबेडकर के बारे में विवादास्पद बयान दिया था, यह लेख 'बुतों के आगे नतमस्तक कौमें' लिखा गया था। दूसरे सभी अखबारों और टीवी वालों ने इस पर मौन साध कर नतमस्तक कौमों की फेहरिस्त में शामिल होने की जैसे मौन स्वीकृति दे दी थी... वही लेख एक बार फिर हम वेबसाइट के जरिए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं...

लोक कथाओं में एक सियासी-दिमाग कंजूस का जिक्र आता है जिसने अपने कृत्य से नस्लों को सीख दी थी कि मुफ्त की लकड़ी मिले तो जीते जी अपनी चिता आप सजा लो। हास्य में कही जाने वाली ऐसी लोक कथाएं आज यथार्थ में घटने लगीं और हमारे आपके दुखद संस्मरण का हिस्सा बनने लगी हैं। सत्ता की ताकत के बूते सत्ताधारिणी जीते जी अपनी ही मूर्ति खुद स्थापित कर उसका अनावरण कर ले, ऐसी घटना आधुनिक राजनीतिक इतिहास की पहली घटना है।
Read More...

खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

कभी नहीं मरूंगा मैं

एक ऐसा शख्स जिसने न केवल इतिहास बदला बल्कि भूगोल भी बदल डाला। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने दुनिया के फलक पर भारत की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित किया। एक ऐसा महायोद्धा जिसने युद्ध के खौफ की परिभाषा बदल डाली। एक ऐसा सेनापति जिसने दुश्मन सेना के सेनापति और उसके एक लाख सैनिकों को घुटने टेकने की विवशता का इतिहास लिख डाला। ऐसे शाश्वत योद्धा की अंतिम दैहिक यात्रा में सत्ता का भोग लगाने वाले सियासतदानों को शरीक होने की फुर्सत नहीं मिली...
Read More...

खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

अब सरमायेदार तय करेंगे केंद्र की सत्ता

सियासतदानों के साथ सरमायेदारों की खिचड़ी पक रही है। नेता और उद्योगपति मिल कर 15वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता पर कौन बैठे और किससे उनके हित सधें इसे लेकर ताना-बाना बुनने का काम तेजी से कर रहे हैं। सियासत की यह कैसी लीला है कि टाटा घराने के रतन टाटा और अंबानी घराने के मुकेश अंबानी मिल कर तीसरे मोर्चे और वाम मोर्चे को मिला कर सत्ता विकल्प खड़ा करने के उद्योग में लगे हुए हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह दुश्चरित्र-तथ्य है। देश में पहले भी मतदान से लेकर सत्ता निर्माण तक धन-सूत्र थामे रहने का खेल पूंजीपति खेलते आए हैं, लेकिन यह पहली बार होगा कि दो-तीन उद्योगपति मिल बैठकर प्रधानमंत्री तय कर लें और गद्दी पर अपना मुहरा बिठा कर सत्ता पर अपनी सीधी पकड़ रखें...
Read More...

खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

मेहमान खिलाड़ियों पर हमले का धर्म...

श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर गोलियां दागने वाले जांबाज जेहादियों के खिलाफ जब शाम तक दुनिया के किसी भी हिस्से से किसी भी इस्लामी धर्मगुरू का कोई फतवा नहीं आया तो हमारे सहकर्मी पत्रकार साथी का वह सवाल मस्तिष्क में फिर बम की तरह फटा कि कौन कहता है कि धर्म किसी व्यक्ति या किसी समुदाय के चरित्र और उसके आचरण पर असर नहीं डालता? साथी के इस सवाल का संशोधन करते हुए भी जवाब पाने के बजाय प्रतिप्रश्न ही कौंधता है कि इस्लाम को मानने वाले लोग इस्लाम के नाम पर ही हो रहे बुद्धिहीन कृत्यों के खिलाफ उठ खड़े क्यों नहीं हो रहे? या तो उन्हें धर्म का अफीम खिला खिला कायर बना दिया गया है, या इस्लाम के नाम पर हो रही अधार्मिक हिंसा को वे मौन सहमति देकर उसमें शामिल हैं। ये दो ही तो बातें हो सकती हैं? या कोई तीसरा तर्क-मार्ग भी है? या बचाव का कोई अन्य रास्ता?...
Read More...

खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

दुर्भाग्यपूर्ण...

बांग्लादेश में सैन्य विद्रोह कोई मामूली घटना नहीं है। उत्तर भारत से छपने वाले अखबारों और टीवी पर दिखने वाले समाचार चैनल वालों ने इस घटना के साथ जिस तरह नेताओं जैसा सलूक किया, वह अक्षम्य है। देश की मुख्यधारा की पत्रकारिता का दावा करने वाले मीडिया का यह हाल है। विचार के दरिद्र जैसे हमारे नेता वैसा ही विचारहीन मीडिया। 'द इंडियंस आर डॉग’ कहते कहते 'द स्लम डॉग’ पर आकर अभिव्यक्त होने वाली गोरों की घृणा के बरक्स गौरवान्वित होने और खींसे निपोर देने की हमारी नस्लीय गुलाम परम्परा पिछले दिनों ऑस्कर को लेकर किस तरह छलकी, वह अखबार और समाचार चैनलों के जरिए पूरे देश के सामने जाहिर हो गई। अब इस पर बहस छोड़ दें। अभी 25 फरवरी को बांग्लादेश में जो सैन्य विद्रोह की घटना घटी उसे उत्तर भारतीय मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दिया। जबकि पश्चिम बंगाल से निकलने वाले तमाम अखबारों, चाहे वह अंग्रेजी हो या बंगाली या हिंदी, सबने सैन्य विद्रोह की खबर को आठ-आठ कॉलम तक की लीड बनाई। अपनी अस्मिता की हिफाजत से जुड़े मुदूदे पर नेता और मीडिया इतना कैजुअल होगा, लापरवाह होगा, यह कितना दुखद है!...
Read More...

खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |


News management powered by Xpression News

News Headlines

News Categories





My ProfileMy Vision | My Philosophy of Life | PRD in the Eyes of... | News/Articles | Aired News
© 2008-2009 All rights reserved. Site Developed by Anshu Pranjal and Designed by Sanjay Jaiswal