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एक मुनादी सच की

हमेशा लीक से हट कर चलने वाले या ऐसे कहें कि लीक पर घिसटते लोगों के खिलाफ हमेशा बगावत कर अपनी अलग धार स्थापित करने की छटपटाहट से भरे लोगों ने लीक पर चलने जैसा नाम क्यों चुना... ‘बाई-लाइन’...?
‘बाई-लाइन’, अखबार के लोगों के लिए उनकी जिंदगी से जुड़ा नाम है। रिपोर्ट के साथ रिपोर्टर का नाम छपना बाई-लाइन है। वैसे, बाई-लाइन का शाब्दिक अर्थ आप सब समझते हैं। ‘बाई-लाइन’ पत्रिका का नाम, महज नाम प्राप्त करने की औपचारिक धुप्पलबाजी का परिणाम नहीं है बल्कि यह नाम एक लंबी विचार-प्रक्रिया का सुविचारित-उत्पाद है। कबीर का एक दोहा है, आपको याद ही होगा... ‘ना मैं जानूं सेवा बंदगी, ना मैं घंट बजाई / ना मैं मूरत धरि सिंहासन, ना मैं पुहुप चढ़ाई / किरिया करम अचार मैं छाड़ा, छाड़ा तीर्थ नहाना / सगरी दुनिया भई सयानी, मैं ही इक बौराना...’

इस दोहे का सत है ‘बाई-लाइन’ और उसका जुझारू दस्ता। मीडिया का क्या हाल है यह आप देख ही रहे हैं। पत्रकार को हाजिर नाजिर कर कभी सच की कसमें खाई जाती थीं। आज वह झूठ, फरेब और दलाली का पर्यायवाची हो गया है। जैसा नेता, जैसा बाबू, जैसा जज, जैसी पुलिस... वैसा ही पत्रकार, वैसा ही मीडिया। ...और इन्हीं लोगों की रची-कुरची लीक पर घिसट रहा है पूरा देश, आजादी के बाद से अब तक लगातार। ‘बाई-लाइन’ इस लीक के खिलाफ बगावत की मुनादी है। ‘बाई-लाइन’ अपनी शुरुआत ही इस घोषणा से करता है कि हम खुद को ऐसे पत्रकारों की कतार में शुमार होने से इन्कार करते हैं। हम ‘सेवा-बंदगी’ और चाटुकारिता करने वाले भांडों की जमात का हिस्सा नहीं और न सत्ता-मंदिरों का घंटा बजाने वाले घटिया पत्रकार हैं। हम न सिंहासनों के हिस्सेदार हैं और न सिंहासनों पर पुष्पांजलि अर्पित करने वाली गुलाम मानसिकता वाली लोकतांत्रिक-प्रजा। हम लीक पर घिसटने और ‘तीर्थों’ की बेमानी परिक्रमा करने वाली नस्लों के आचार-संस्कार को धिक्कार भेजने वाले फक्कड़ हैं, जिन्हें केवल सच के प्राकृतिक स्वरूप की फिक्र है... और कुछ नहीं। दुनिया खुद को सयानी समझती है तो समझती रहे... ‘मैं ही इक बौराना’...।

‘सच’ इस समाज में साबुन तेल की तरह का एक उत्पाद होकर रह गया। खूब बेचा गया। किस्म-किस्म के झूठ-फरेब किस्म-किस्म के रंगीन चमचमाते पैकेटों में लपेटकर सच के बतौर बाजार में पेश किए गए। बेईमानी सच्चाई पर सरेआम उंगली उठा रही है और सच्चाई सबूत तलाश रही है! विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता सबने मिल कर सच्चाई के साथ दुराचार किया है और समाज ने उस बलात्कार का तटस्थ-सुख लिया है। हम इन बलात्कारियों के खिलाफ मारक-दस्ता हैं। ठीक है कि जमात इनकी बड़ी है और हम थोड़े, लेकिन अकेले दम पर खम ठोक कर मजबूत आवाज निकालने, अपनी मुट्ठियां तान कर अलग खड़े हो जाने और तबीयत से एक पत्थर उठा कर दे मारने से हमें कोई रोक सकता है क्या...? ‘बाई-लाइन’ इसी बहती हुई विचारधारा का नाम है। ‘बाई-लाइन’ सड़ांध देती लीक के बरक्स एक आजाद खयाल, सच के प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज अपना अलग ही ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ रचने के ख्वाब के शक्ल लेने का नाम है। ‘बाई-लाइन’ आपको लीक बदल कर देखने और सोचने की मजबूती देने और हर समय आपके साथ खड़ा रहने के संकल्प का नाम है। हम सच को बेचने नहीं, सच को बल देने और सच के लिए बलि चढ़ने के लिए हर पल तैयार रहने की सनद देने आए हैं। सच हमारे लिए पोस्टर और होर्डिंग का ‘सामान’ नहीं... सच हमारे लिए ईश्वर है। हमें इसकी आराधना करनी है। सत्ता-मंदिर के बजाय हमें सत्य-मंदिर का घंटा बजाना है। सच का अजान देना है। सत्य की गुरुबानी पढ़नी है या सत्य के लिए कुरबानी देनी है...
पत्रिका का नाम काफी सोच विचार कर रखा गया, इसी तरह इस साप्ताहिक संपादकीय कह लें या साप्ताहिक स्तंभ या कॉलम... इसके नाम पर भी खूब मंथन हुआ। हर हफ्ते आपसे मेरी बातचीत पत्रिका के इसी आखिरी पन्ने पर हुआ करेगी और हर हफ्ते व्यवस्था के किसी न किसी खलनायक-पहलू या खलनायक-चेहरे पर करारा तमाचा पड़ेगा... इसीलिए इसका नाम अंग्रेजी में ‘लास्ट-पंच’ रखा गया। हिंदी में इसका नाम ‘अंत-अनंत’ चुना गया। हिंदी अपेक्षाकृत अधिक विनम्र है, लिहाजा ‘लास्ट पंच’ का शाब्दिक अनुवाद ‘आखिरी घूंसा’ अनुचित प्रयोग हो जाता। ...और आप यह साफ साफ समझ लें कि ‘बाई-लाइन’ अंग्रेजी हो या हिंदी, दोनों में से कोई भी किसी का भी अनुदित संस्करण नहीं है। दोनों अपनी अपनी भाषा और आत्मा से पूरी .तरह मौलिक हैं... बिंदास हैं। पत्रिका का यह आखिरी पन्ना तो है... पर अंत के इस पन्ने के जरिए जो प्रहार होगा, जो मुनादी होगी उसकी अनुगूंज अनंत तक जाएगी...

आपसे मिलने की शुरुआत हुई है। अगले हफ्ते हम फिर मिलेंगे और हर हफ्ते मिलेंगे। इस आखिरी पन्ने पर यह जो विचार है वह आपका ही है, हम तो केवल इसे सशक्त अभिव्यक्ति दे रहे हैं। अगर कभी आपको ऐसा लगे कि आप कहीं किसी बिंदु पर असहमत हों तो जरूर लिखें। अगर कभी आपको ऐसा लगे कि कोई बात कहने से रह गई है, तो आप जरूर लिखें। अगर कभी आपको ऐसा लगे कि आपकी समस्या से जुड़ी कोई बात ‘बाई-लाइन’ के मंच से अभिव्यक्त होनी चाहिए, तो आप जरूर लिखें। इसे बार-बार कहना उचित नहीं। इसे आप ही को समझना है कि हम आपके साथ खड़े हैं और आपका सहयोग, आपकी शुभकामनाएं और आपका आशीर्वाद हमें मजबूती से खड़े होने में बल देता है...

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) January 16, 2009 Issue under regular column - अंत-अनंत)


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