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| गणतंत्र या षडयंत्र |
अखबारों में प्रकाशित एक खबर देख कर सुबह-सुबह मन आक्रोश से भर गया। खबर थी कि विमान अपहरण करने वालों के खिलाफ केंद्र सरकार फांसी की सख्त सजा का प्रावधान करने जा रही है। सत्ता सियासतदानों को वोट की राजनीति से फुर्सत मिले तो देशहित समझ में आए। इन्हीं झंडाबरदारों के नेतृत्व में अपना देश विमान अपहरण करने वालों के आगे नतमस्तक होकर जेल में बंद कुख्यात आतंकियों को कंधार ले जाकर छोड़ आने से लेकर संसद पर हमला करने वाले आतंकी को दामाद बनाए रखने तक की सतत स्खलन-यात्रा पर अग्रसर है। भारत की आजादी के 63 साल और भारतीय गणतंत्र के 60 साल हो चुके पर अपनी आजादी और अपनी गणतंत्रता नाबालिग ही रह गई।
भारत के आजाद होने के बाद या उसके गणतंत्र होने के बाद से लगातार देश के लोगों ने देश के सरोकारों को लेकर राजनीतिज्ञों का ड्रामा ही तो देखा है। नेताओं के इस प्रहसन या उनकी आपराधिक उपेक्षा के हम शिकार हुए हैं। इस गणतंत्र में केवल नेताओं के षडयंत्र हैं। नेताओं की वजह से लोकतंत्र के चारों स्तम्भ खोखले हो गए। आज जब हम देश के 60वें गणतंत्र दिवस उत्सव के सरकारी ड्रामेबाजी का फिर से गवाह बनने जा रहे हैं तो इस मौके पर अपनी साठ वर्षीय व्यवस्था की विवेचना तो हमें करनी ही चाहिए। देश में भीषण बढ़ती महंगाई, देश के चहुंमुखी विकास को लेकर विज्ञापित किए जाते फर्जी सरकारी आंकड़े और आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक अराजकता को थोड़ी देर के लिए अलग रख कर केवल सुरक्षा के मसले पर ही विचार करें तो हम खुद को कहां पाते हैं...? चीन के हाथों हम लगातार अपनी भूमि खोते जा रहे हैं। पाकिस्तान के साथ हम निरंतर प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्ध में जूझ रहे हैं। राजनीति के उन विदूषकों के लिए, जिन्होंने देश के साथ 63 साल तक केवल भद्दा मजाक ही किया और कुछ नहीं! आजादी के बाद से आज तक देश के जरूरी मसलों के साथ नेताओं ने बदसलूकी की है और नागरिकों का बेजा इस्तेमाल। समर्पण और राष्ट्रभक्त के भाव से आज हम बिल्कुल खोखले हो चुके हैं। योजनाएं बनाने वाले, उसे लागू करने वाले, न्याय देने-दिलाने वाले और खबरें पढ़ा-सुना कर लोकतंत्र की हिफाजत करने वाले सब आज भ्रष्टाचार और दलाली के पर्याय हो चुके हैं। इस देश में आज केवल नेता सुरक्षित रह गया है। पुलिस, गुंडे बटमारों का साथ देने और नेताओं का चरण चाटने वाले वर्दीधारियों की घृणित जमात बन कर रह गई है। भारत के लोगों के पास संकल्प नहीं है इसीलिए उन्हें कोई विकल्प भी नहीं दिखता।
आज किसी भी मानव जनित या प्रकृति जनित हादसे में हमें सेना ही क्यों याद आती है...? आतंकी हमला हो या बाढ़ या भूकंप, राजनीतिक संकट की घड़ी हो, आंदोलन हो या कानून व्यवस्था की कोई गंभीर समस्या, बच्चा सुरंग में गिर जाए या नक्सलियों से निबटना हो... सब में सेना ही क्यों बुलाई जाती है। फिर यह लंबी चौड़ी पुलिस व्यवस्था, ये गंदे नौकरशाह क्या केवल देश को खाने के लिए रखे गए हैं...? जब इनका कोई औचित्य ही नहीं तो क्यों न देश से नौकरशाही समाप्त कर दी जाती...? देश को नष्ट कर रही ऐसी सड़ी हुई विधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका से हम क्यों नहीं मुक्त पाते...? इस पर सोचें...
लेकिन हम ऐसा सोच भी नहीं सकते... क्योंकि हमने व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय सहित सभी नैतिक मूल्य खो दिए हैं। हमने अपनी राष्ट्रीयता और प्रतिबद्धता के साथ समझौता कर लिया है। यह सब योजनाबद्ध तरीके से हुआ और हम राष्ट्र को मजबूत करने के बजाय उसे जर्जर करने, भाषा क्षेत्र और धर्म के नाम पर एक-दूसरे से लड़ने में उलझ कर रह गए। हमने अपनी करतूतों से जो रचा उसके लिए आस्ट्रेलिया जाकर पिटने की क्या जरूरत है...? बस अपने इसी गणतंत्रात्मक देश के एक राज्य से दूसरे में प्रवेश करें और भोगें... एक जन प्रतिनिधि के राष्ट्रभाषा हिन्दी में शपथ लेने पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की नपुंसक-टोली का खून खौलता हो और देशवासियों का खून ठंडा रह जाता हो तो क्या होगा...? उसी महाराष्ट्रवाद की बात करें तो मनसे की टोली मुंबई पर हुए आतंकी हमले के समय किस बिल में घुसी हुई थी...? उस समय महाराष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए लड़ने आए एनएसजी के कमांडो और कुर्बानी दी सुदूर दक्षिणी राज्य के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने। ऐसे ही घटिया नेताओं का यह गणतंत्र है और इन्हें ही गणतंत्र दिवसों पर शौर्य पदक देकर सम्मानित किया जाएगा... अब यही समय आने वाला है।
पाकिस्तान जैसा देश जो अपने पैर पर ठीक से खड़ा भी नहीं हो सकता, उसने भारतीय संसद पर हमला करा दिया और हम आज तक उसके हमलावर अफजल गुरु को फांसी नहीं दे पाए। अमेरिका की हम भौंडी नकल कर सकते हैं, सीख नहीं ले सकते कि 9/11 हादसे के बाद से आज तक अमेरिका में कोई आतंकी घटना क्यों नहीं हुई और हमारे यहां इसकी कतार लगी हुई है...? क्यों कसाब को लेकर हमारी न्याय-प्रणाली बेमानी कानूनी प्रक्रिया में उलझी पड़ी है जब सब कुछ सामने दिखा और संसार भर के लोगों ने उसे देखा...? देश की कीमत पर अफजल गुरु या कसाब जैसे आतंकवादियों की हिफाजत करने में लगे राजनीति प्रेरित मानवाधिकारकर्मियों की अन्य देशों में कमी है पर अपने देश में ये थोक के भाव में मिलते हैं। सब खा कमा रहे हैं। दुर्ग में रह रहे हैं, सुरक्षा काफिलों में घूम टहल रहे हैं। 63 साल से हम यही देख रहे हैं और मर रहे हैं... आखिर कबतक..??
(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) January 30, 2010 Issue under regular column - अंत-अनंत)
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