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दुर्भाग्यपूर्ण...

बांग्लादेश में सैन्य विद्रोह कोई मामूली घटना नहीं है। उत्तर भारत से छपने वाले अखबारों और टीवी पर दिखने वाले समाचार चैनल वालों ने इस घटना के साथ जिस तरह नेताओं जैसा सलूक किया, वह अक्षम्य है। देश की मुख्यधारा की पत्रकारिता का दावा करने वाले मीडिया का यह हाल है। विचार के दरिद्र जैसे हमारे नेता वैसा ही विचारहीन मीडिया। 'द इंडियंस आर डॉग’ कहते कहते 'द स्लम डॉग’ पर आकर अभिव्यक्त होने वाली गोरों की घृणा के बरक्स गौरवान्वित होने और खींसे निपोर देने की हमारी नस्लीय गुलाम परम्परा पिछले दिनों ऑस्कर को लेकर किस तरह छलकी, वह अखबार और समाचार चैनलों के जरिए पूरे देश के सामने जाहिर हो गई। अब इस पर बहस छोड़ दें। अभी 25 फरवरी को बांग्लादेश में जो सैन्य विद्रोह की घटना घटी उसे उत्तर भारतीय मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दिया। जबकि पश्चिम बंगाल से निकलने वाले तमाम अखबारों, चाहे वह अंग्रेजी हो या बंगाली या हिंदी, सबने सैन्य विद्रोह की खबर को आठ-आठ कॉलम तक की लीड बनाई। अपनी अस्मिता की हिफाजत से जुड़े मुद्दे पर नेता और मीडिया इतना कैजुअल होगा, लापरवाह होगा, यह कितना दुखद है!

देश को केवल पाकिस्तान से खतरा नहीं है कि हर बात में नेता और मीडिया पाकिस्तान पाकिस्तान की रट लगाता रहे। अधिक खतरा बांग्लादेश से है जो धीमी गति के जहर के मानिन्द देश की नसों में भीतर तक घुलता जा रहा है। खतरा नेपाल से है जहां बदले हुए राजनीतिक दौर में नक्सलवाद और माओवाद के नाम पर अपराध और आतंकवाद का ताकतवर गलियारा स्थापित करने के तमाम प्रयास चल रहे हैं। बांग्लादेश और नेपाल में ऐसी किसी गतिविधि या घटना के प्रति हम उपेक्षापूर्ण रवैया अख्तियार करें तो हमें यह मान लेना चाहिए कि हम अकल से पैदल हैं। पूरा देश बांग्लादेशी घुसपैठियों से आक्रांत है। बांग्लादेशी घुसपैठिये भारतीय व्यवस्था में जिस तरह घुस बस गए हैं कि उनकी पहचान मुश्किल हो गई है। अधिक मुश्किल उनका यहां से वापस खदेड़ा जाना हो गया है। वोट के लिए देश को गिरवी रख देने में शर्म नहीं करने वाले नेताओं ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के बबूल के जंगल उगाए हैं अपने देश में।

नेताओं के कारण ही मणिपुर, असम, त्रिपुरा से गुजरात और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बांग्लादेशी घुसपैठियों का भारतीयकरण हो गया है। उनके वोट के बूते जीत कर नेता सत्ता-सुख भोगते हैं, लेकिन देश को इसका कितना दुख भोगना पड़ेगा, वह आगे पता चलेगा। लेकिन इसे लेकर सतर्कता बनाए रखने, देश के नागरिकों को खबर से परिचित कराए रखने और खबरदार करते रहने की जिम्मेदारी मीडिया की ही तो है! क्या उत्तर प्रदेश के लोगों से मीडिया को यह उम्मीद नहीं थी कि वह भी पड़ोसी मुल्क की इस गंभीर घटना के बारे में तफसील से जानना चाहेंगे? दिन भर अंट-शंट दिखाने वाले समाचार चैनेलों और अखबार वालों ने खुद को बुद्धिमान और आम लोगों को बेवकूफ और कूप मंडूक मान रखा है?

बांग्लादेश राइफल्स के जवानों ने विद्रोह कर दिया तो हजारों किलोमीटर की भारतीय सीमा पर किस तरह की अफरातफरी और घुसपैठ की भागादौड़ी मची होगी, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। उधर बीडीआर और इधर बीएसएफ के होते हुए जब बांग्लादेशी घुसपैठ को हम संभाल नहीं पा रहे हैं तो बीडीआर के सीमा छोड़ देने पर क्या हालत हुई होगी, उसके बारे में सोचें। हमारे देश के नेता जिस तरह के प्रदूषक और विदूषक चरित्र के हैं उसी तरह मीडिया भी हो जाए तो बंटाधार सुनिश्चित मानिए। हमारे खुफिया तंत्र को भी नहीं मालूम कि बीडीआर के विद्रोह से कुछ समय के लिए खाली हो गई बांग्लादेश सीमा पर क्या हालत हुई होगी। ...और न केंद्र सरकार या गृह मंत्रालय ने इस बारे में देश को कोई सूचना देने की जरूरत ही समझी। यह वही देश है जहां बीएसएफ के जवानों की हत्या कर बांग्लादेश राइफल्स के जवान उनकी झुलसी हुई लाशें जानवरों की तरह बांस पर टांगे प्रदर्शन करते हैं और भारतीय सत्ता अलमबरदार कूटनीति के नाम पर किन्नरी-चुप्पी साधे रहते हैं। ऐसी घोर घटनाएं भी मीडिया के लिए 'ईश्यू’ नहीं बनतीं। प. बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार जीबानंद बसु से बांग्लादेश के ताजा घटनाक्रम को लेकर आज बात हो रही थी तब यह अहसास हुआ कि वहां के पत्रकार देश के सरोकारों को लेकर कितने चिंतित हैं। जीबानंद बसु ने जब उत्तर भारतीय मीडिया द्वारा इस घटना को तवज्जो नहीं दिए जाने की बात सुनी तो उन्हें पहले तो भरोसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, 'तूमी की बोलछो?’ उन्हें हंसी आ गई फिर गंभीर होते हुए कहा, 'एई तो अत्यंतो चिंताजोनोक आर दुर्भाग्योपूर्ण विषोय’...

Published in Daily News Activist on Friday February 27, 2008.


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