Home | Contact
  My Profile
  Aired News
  Contact
  News/Articles


Loading...


News / Articles

‘थ्री लाइव इडियट्‌स’...

वह एक आम आदमी का कटाक्ष था, पर बेहद सटीक और ऐन वक्त पर... बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे जब भारतीय लोकतंत्र की खिल्लियां और धज्जियां, दोनों उड़ाने में लगे थे उसी समय यह टिप्पणी आई कि मुंबई ने तो काफी पहले ही ‘थ्री इडियट्‌स’ दे दिए थे, बॉलीवुड ने तो बाद में दिए ‘थ्री इडियट्‌स’। देश के एक आम आदमी ने मुंबई के जिन ‘तीन महामूढ़ों’ के बारे में ऐसा कहा वह देश के सामने स्पष्ट है। लेकिन पॉलिटिक्स के ‘थ्री इडियट्‌स’ और बॉलीवुड के ‘थ्री इडियट्‌स’ में मौलिक फर्क है... पहले वाले को पूरा देश घृणा कर रहा है और बाद वाले को प्रेम। विडंबना यह है कि पहले वाले असली पात्र हैं जबकि बाद वाले प्रहसन के पात्र। बाल ठाकरे, उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे जैसे भारतीय राजनीति के ‘तीन महामूढ़’ मुंबई के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए नासूर बनते जा रहे हैं।

ठाकरेयों और राहुल के बयान की सरगर्मियों के बीच राहुल की मुंबई यात्रा से देश भर में एकता का संदेश प्रसारित हुआ, इसमें कोई संदेह नहीं। राहुल ने सही कहा कि भारत सभी भारतीयों का है और भारतीयों को अपने देश में कहीं भी जाने, कमाने और बसने का अधिकार है। राहुल के बयान और उनकी मुंबई यात्रा को एकपक्षीय होकर नहीं बल्कि सही और समग्रता से देखने समझने का फिर से मौका मिला है। भारत के लोगों को निश्चित तौर पर उस चिर-अनुत्तरित प्रश्न का जवाब चाहिए कि राहुल समेत देश के तमाम नेताओं के पास यह नैतिक बल क्यों नहीं है कि वे यह कह सकें कि जम्मू कश्मीर भी भारतीयों का है। उतना ही जितना महाराष्ट्र या मुंबई! एक भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर या पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में जमीन क्यों नहीं खरीद सकता? यदि मुंबई भारतीयों की है तो कश्मीर भी भारतीयों का है। राहुल गांधी के बयानों का भरोसा लेकर कोई भारतीय यदि कश्मीर में जमीन खरीद कर वहां रहना चाहे तो क्या राहुल उसे वहां बसाने में मदद करेंगे? देश के लोगों और कश्मीर से खदेड़ भगाए गए कश्मीरी पंडितों को इस सवाल का जवाब तो चाहिए न...! यदि राहुल खुद को या भारत को महान साबित कराना चाहते हों तो उन्हें इसका जवाब समाधान की शक्ल में देश के लोगों को देना ही चाहिए।

देखिए... भारत के नेताओं को देश-वेश से कोई लेना-देना है नहीं, चाहे वे ठाकरेयों का मामला हो या किसी अन्य का। उन्हें अपनी सुविधा और अवसर के मुताबिक ‘इमोशनल अत्याचार’ करना है... उनका इरादा केवल देश को लूटना और बर्बाद करना है। इस परिप्रेक्ष्य से देखें तो साफ दिखेगा कि शिव सेना या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उसके तीन नेता किस नैतिक जमीन पर खड़े हैं। लेकिन ठाकरे हमारे लिए मुद्‌दा नहीं हैं। यह तो गैरजिम्मेदार मीडिया है जो ऐसा कर रही है। दरअसल भारतीय मीडिया भी ऐसे तमाम ‘इडियट्‌स’ का जमावड़ा हो गई है, जिनके पास न समाचार की अक्ल है और न राष्ट्रीयता की। भारत में मीडिया की विशेषज्ञता अवांछित नेताओं या उनके अतिरंजित बयानों को उछालने पर केंद्रित है जो देश की एकता को छिन्न-भिन्न करते हों। मीडिया और मंथरा में कोई फर्क नहीं... बस इतना ही कि मंथरा कुछ लोगों को नुकसान पहुंचाती है और मीडिया पूरे देश को। मुंबई घटनाक्रम के मद्‌देनजर राहुल ने जो गंभीरता और राजनीतिक मर्यादा दिखाई वह वाकई प्रशंसनीय है। वयोवृद्ध बाला साहब ठाकरे लिखने-बोलने की मर्यादा का पालन नहीं करते तो उद्धव और राज से इसकी उम्मीद कैसे की जा सकती है। ‘इटैलियन मम्मी’, ‘प्रिंस ऑफ कांग्रेस’, ‘मुसोलिनी राहुल’ और कई अन्य अप्रकाशनीय शब्दावलियों से किया गया संबोधन ही राहुल और ठाकरेयों के राजनीतिक गांभीर्य का फर्क उजागर करने के लिए काफी है। दूसरी तरफ आप देखें कि राहुल ने अपनी बात कैसे कही थी..., ‘मेरी इसमें कोई रुचि नहीं कि बाला साहब, उद्धव ठाकरे या राज ठाकरे ने क्या कहा। मेरी दिलचस्पी तो एक ही सोच में है कि भारत भारतीयों का है और देश का हर हिस्सा देश के लोगों का है। 26 नवम्बर के मुंबई हमले में एनएसजी के जिन जांबाजों ने आतंकवादियों से लोहा लिया उनमें बिहार, यूपी, गुजरात, हिमाचल और महाराष्ट्र सब जगह के लोग थे। उस समय तो शिव सेना या मनसे ने यह नहीं कहा कि बिहार-यूपी वालों को बाहर निकालो। भारत को आगे बढ़ना है और सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना है।’ ... राहुल का यह बयान उनके मर्यादित राजनीतिक प्रशिक्षण की सनद देता है। यह हो सकता है कि राहुल का बयान बिहार में आने वाले चुनाव में राजनीतिक फायदा उठाने के इरादे से आया हो, लेकिन जहां तक राष्ट्रीय एकता और राजनीतिक मर्यादा की अभिव्यक्ति की मौजूदा जरूरत का सवाल है तो निश्चित तौर पर राहुल ने खुद को अलग और बेहतर साबित किया है।

ठाकरेयों के प्रसंग को बृहत्तर दायरे में रखते हुए हम यह तो समझते ही हैं कि नेताओं को महज फूट डालो-मतलब साधो से मतलब है। यह फार्मूला उनका हथियार है और हम उसके शिकार। आप शिव सेना को ही देखें, पहले मुसलमानों पर निशाना साधा। हित सधते ही ‘लुंगी-लुंगी’ कह कर तमिलों का मुद्‌दा उठाया। फिर सेना और मनसे ने शुरू कर दिया बिहारियों और यूपी वालों से घृणा फैलाने का सिलसिला। ...आप देखते जाएं, ये जल्दी ही मुंबईवाला, नासिकवाला, पुणेवाला, नागपुरवाला, विदर्भवाला जैसे भेद फैला कर महाराष्ट्र को तोड़ते दिखेंगे। यह तो किसी के वफादार नहीं हैं। इन्हें मुंबईकरों की जहालत की जिंदगी या महाराष्ट्र में आत्महत्या करते किसानों से कोई हमदर्दी नहीं। ठाकरेयों को किसानों की मौत पर बिफरते देखा है कभी? उन्हें जब केवल भौतिक उपलŽधयों से मतलब है तो हम ही क्यों चुनें नेताओं को भावनाओं के बूते... देश व समाज हित के कार्यों के भौतिक सत्यापन के बाद ही हम निर्णय लें कौन होगा हमारा प्रतिनिधि...

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) February 20, 2010 Issue under regular column - अंत-अनंत)


खबरें @ बाई-लाईन | comments (0)

News management powered by Xpression News

News Headlines

News Categories





My ProfileMy Vision | My Philosophy of Life | PRD in the Eyes of... | News/Articles | Aired News
© 2008-2009 All rights reserved. Site Developed by Anshu Pranjal and Designed by Sanjay Jaiswal