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| रक्तरंजित कौन, मिस्टर खान मौन... |
लोगों का ध्यान खींचने में माई नेम इज़ खान ने बड़ी धूर्त कामयाबी हासिल की। जनता के साथ लगातार खिलवाड़ हो रहा है, उसे मूर्ख बनाया जा रहा है, लेकिन उसकी आंख नहीं खुलती और वह हमेशा दूसरा तमाचा खाने के लिए तैयार होती रहती है। आप देखें हिंदुओं की वकील शिवसेना ने किस तरह माई नेम इज़ खान की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया! धन और सत्ता के खेल का असली चेहरा यही है। इसका धर्म, राजनीति या भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं। इस क्रूर खेल के सूत्रधारों के लिए आम आदमी भारी तादाद में पैदा होने वाले ब्रॉयलर चिकन की तरह है जिसका एक ही निदान है... ज़बह... हलाल। यह जो लिखा है वह देश के लोगों के अब तक के लगातार हो रहे अनुभवों का कठोर तथ्य है।
जब मुंबई, महाराष्ट्र और देश भर के सिनेमा घरों में माई नेम इज़ खान चल रही थी और उस फिल्म का हीरो यह कह रहा था कि मुसलमान आतंकवादी नहीं होता... ठीक उसी समय मुंबई के पास के एक शांत शहर पुणे की सड़क पर मासूम लोग रक्तरंजित पड़े थे और मर रहे थे।
सिनेमा हॉल में लोगों को बेवकूफ बना रहा माई नेम इज़ खान का हीरो क्या देश को यह बता सकता है कि पुणे में हुए बम धमाकों के पीछे कौन से नारकीय लोग थे? यह अब्दुस सुभान कुरैशी, मोहसिन चौधरी, रियाज भटकल, इकबाल भटकल वगैरह कौन हैं और यह इंडियन मुजाहिदीन या लश्करे तैयबा क्या बला है? मिस्टर खान जरा बताएं कि ये आखिर हैं कौन? इनका धर्म क्या है? ...और अगर इनके कृत्य इतने ही नागवार और घृणित हैं तो फतवा-पसंद मौलानाओं की जमात क्यों नहीं जारी करती इनके नाम से इनके खिलाफ फतवा? आतंक फैलाने में लगे बदमाशों के नाम से फतवा जारी करने से मौलाना क्यों बचते हैं? किसी भी आतंकी घटना में आप पाएंगे किसी स्थानीय व्यक्ति का साथ और स्थानीय नेता का संरक्षण। कौन हैं ये? क्या ये ईसाई हैं, हिंदू हैं, बौद्ध हैं या सिख हैं?
देश को सड़ाने में लगे तथाकथित प्रगतिशीलों को अनगिनत आतंकी हादसों में से एक ही घटना याद रहती है, मालेगांव विस्फोट और दो ही नाम याद रहता है साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित। वोट की राजनीति के लोभ में फंसे क्षुद्र नेता भी यही रटते हैं। लेकिन इस पर पूरा देश क्यों मौन साधे बैठा है? जानलेवा हमला और उससे बचाव का उपाय, दोनों क्या एक ही है?
भारत का कानून या प्रकृति का नियम, सब किसी भी प्राणघातक हमले से बचने के लिए रक्षात्मक तरीके अख्तियार करने की इजाजत देता है। इसीलिए तो कानून देश के नागरिक को अपनी रक्षा के लिए हथियार रखने की इजाजत देता है! उन्हीं नागरिकों को इस सवाल का जवाब चाहिए कि देश को बचाने की बेचैनी और देश को बर्बाद करने की हरकतें एक ही विधिक धरातल पर रख कर क्यों देखी जा रही हैं?
देश को बचाने में सरकार फेल हो जाए तो क्या देश के लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? भारत का संविधान भारतीय नागरिक को देश हित की रक्षा में खड़े होने की कानूनी तौर पर भी इजाजत देता है। राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रप्रेम एक ही फ्रेम में रख कर थोड़े ही देखे जा सकते हैं। गद्दार और देशभक्त एक ही कानून से व्यवहृत नहीं हो सकते। किसी भी नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य है कि वह देश को कमजोर कर रहे गंदे परजीवियों को पनपने से रोके, उसे नष्ट करे। ...और कोई उपाय भी नहीं।
समय और अनुभव दोनों ही अब इतने परिपक्व हो गए हैं कि हमें यह साफ-साफ समझ आ रहा है कि राष्ट्रद्रोही तत्वों से नेताओं के हाथ मिले हुए हैं। ऐसे तत्व देश की राजनीति और सत्ता निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो मुंबई सदमे से अब तक नहीं उबरे देश को पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता के दुर्बुद्धिपूर्ण प्रस्ताव का राजनीतिक फैसला नहीं देखना पड़ता। इसका क्या तुक था? भारत सरकार द्वारा शुरू की गई पाकिस्तान की मक्खनबाजी क्या लोगों को समझ में नहीं आती?
बहरहाल, फिर माई नेम इज़ खान एपिसोड पर लौटते हुए हम पर्दे के पीछे झांक कर देखें तो तस्वीर साफ-साफ दिखेगी। फिल्म अभिनेता शाहरुख खान से राहुल और प्रियंका की अंतरंगता जगजाहिर है। अब आप गौर करें... फिल्म के रिलीज़ होने के ऐन पहले शाहरुख ने अचानक पाकिस्तान-परस्त राग अलापना शुरू किया और इसके जवाब में बाल ठाकरे ने राग उलटबांसी। बिहार का दौरा कर रहे राहुल ने बयान देकर सरगर्मी पैदा की और मुंबई यात्रा करने का ऐलान कर आग को और हवा दे दी। फिल्म के रिलीज़ होने की तारीख और करीब आ गई थी। अब ड्रामा मुंबई की सड़कों और गलियों में था। राहुल ने अपने तरीके से उकसाया तो ठाकरेयों ने अपने तरीके से भड़काया। राहुल बनाम ठाकरे ने आम तौर पर पूरे भारत और खास तौर पर मुंबई को गर्म कर रखा था। शाहरुख शांत बैठ गए। उद्देश्य पूरा हो चुका था। फिल्म को नाम, इनाम और शोहरत सब मिल चुकी थी। शाहरुख-करण को आर्थिक लाभ हुआ, राहुल-ठाकरेयों को राजनीतिक फायदा और जनता हमेशा की तरह फिर से उल्लू बनी।
महाकवि दिनकर की दो पंक्तियां पेश हैं... अधिकार खोकर बैठ रहना, यह महादुष्कर्म है / न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है... हमें यह आत्मबोध तो होना ही चाहिए कि धतकरमों में लगा व्यक्त अपना या समाज का या देश का मित्र नहीं हो सकता, उसे सख्त दंड मिलना ही चाहिए। कैसे... इस पर विचार करें...
(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) February 27, 2010 Issue under regular column - अंत-अनंत)
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