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नक्सलियों की यह ‘भ्रांति-क्रांति’

नक्सलियों ने पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में तैनात ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स (ईएफआर) के दो दर्जन से अधिक जवानों को बर्बर तरीके से मार डाला। यह केवल ईएफआर जवानों की हत्या नहीं थी, बल्कि इसे भारत की नागरिक (सिविल) पुलिस व्यवस्था की हत्या के रूप में देखा जाना चाहिए। ईएफआर राज्य की पुलिस नहीं, यह सीआरपी बीएसएफ की तरह अर्ध सैनिक बल है। पश्चिम बंगाल की इस लहूलुहान घटना के मद्‌देनजर आप देश की स्थितियों को देखें और उसकी समीक्षा करें... मौके से आई खबरें और चश्मदीदों के बयान से यह साबित हो गया है कि जिन गोलियों की बौछार से ईएफआर के जवान मारे गए, वे गोलियां पश्चिम बंगाल पुलिस की थीं। बंगाल पुलिस की वे गोलियां नक्सलियों द्वारा लूटी हुई नहीं बल्कि बंगाल पुलिस के लोगों द्वारा नक्सली संगठनों तक ‘सप्लाई’ की गई थीं। घटना के समय बंगाल पुलिस के जवान और अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे और धूर्त दर्शक की भूमिका निभाते रहे।

देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था का आधारभूत ढांचा बुरी तरह ध्वस्त हो चुका है। आम नागरिक की सुरक्षा नागरिक-पुलिस का प्राथमिक दायित्व होता है, लेकिन हो क्या रहा है, यह देश के सामने साफ है। नेताओं ने पुलिस को अपना गुलाम बना रखा है और पुलिस को भी नेताओं का तलवा चाटने में आनंद आने लगा है। इस वजह से आंतरिक सुरक्षा का भार भी सेना और अर्ध सैनिक बलों पर ही आ गया, जबकि इनका इस्तेमाल केवल आपातकालीन स्थितियों में होना था। ...और सिविल पुलिस ‘सियासी-पुलिस’ होकर रह गई। आप कहीं भी, सड़क पर या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर पुलिस को राजनीतिक आकाओं की चाकरी करते हुए देख सकते हैं। चाहे वह नेताओं के कार-काफिले के लिए रास्ता खाली कराने का काम हो या नेताओं को अवांछित सुरक्षा देने का, चाहे नेताओं के लिए सब्जी वगैरह लाने का, चाहे नेताजी के बच्चों को खेलाने या उन्हें स्कूल पहुंचाने का, चाहे नेताजी के लिए दलाली करने का... मर्यादित शब्दों में अगर बात करें तो पुलिस के कर्मचारी या अफसर नेताओं के पालतू बन कर रह गए हैं... और यदि उनके अमर्यादित आचरणों के लिए उसी तरह के शब्दों की ओर इंगित करें तो नेताओं के सामने पुलिस वालों की हैसियत के बारे में बिना कहे आप सटीक समझ सकते हैं।

आजादी के बाद से छह दशक बीत गए लेकिन आती-जाती रही सरकारें देश की सिविल पुलिस को जिम्मेदार और लोकतांत्रिक नहीं बना पाईं। यह नाकामी नेताओं की सोची-समझी साजिश है। नतीजतन, आज सिविल पुलिस का मतलब ही अपराधी, अवैध एवं अवांछित गतिविधियों में संलग्न नेताओं और धनपशुओं को संरक्षण देना, उत्साहित करना और उनके लिए दलाली करना भर रह गया है। नेता देश के आधुनिकीकरण व विकास के फर्जी आंकड़ों का प्रदर्शन करते हुए तमाम दावे पेश करते हैं, लेकिन यह बताने से कन्नी काट जाते हैं कि पुलिस को मध्यकालिक-गुलाम बना कर रखने में उनका क्या स्वार्थ है। पत्रकारीय दिनचर्या में ऐसे जाने कितने पुलिस अधिकारी मिलते हैं जो यह मानते हैं कि राजनीतिकों के इशारे या निर्देश पर वे लगभग रोजाना ही कानून की ऐसी-तैसी करते हैं। कई अफसर तो नेताओं के इशारे पर की जाने वाली ‘इन्काउंटर-किलिंग’ की बात बताते हैं। किसी भी नागरिक को पुलिस हिरासत में लेकर उसके साथ किया जाने वाला बर्बर उत्पीड़न और इस वजह से होने वाली मौतें, पुलिस की ‘रुटीन-हैबिट’ बन गई हैं। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह सुधारने का निर्देश दिया था, लेकिन सरकार इसे लागू करने में फेल हो गई।

अब बात अराजक नक्सलियों के वर्ग संघर्ष और निम्न आयवर्ग से आने वाले सिपाहियों के कत्लेआम के विरोधाभासी सिद्धांतों की... आपने क्या कभी सुना है कि नक्सलियों ने किसी पूंजीपति को अपना निशाना बनाया! या कभी किसी बड़े महिमामंडित नेता पर लक्ष्य साधा! या किसी शक्तिशाली नौकरशाह पर हमला किया! आप यह साफ-साफ समझ लें कि जंगलों में घुसे नक्सली गिरोह जंगल-राज कायम करने में लगे हैं। नक्सलियों की तथाकथित क्रांति और कुछ नहीं बल्कि हफ्ता-वसूली-क्रांति है। बड़े पूंजीपति, बड़े नेता और बड़े नौकरशाहों पर हमला नहीं करने के पीछे नक्सलियों की यही ‘क्रांति’ असली वजह है। ‘धन दो या संरक्षण’... बस इसी एक फार्मूले पर नक्सलियों की ‘क्रांति’ केंद्रित होकर रह गई है। नक्सलियों के बड़े लीडरानों के बच्चे देश और विदेश के शीर्ष पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं। इनके आलीशान बैंक अकाउंट देश और विदेश के बैंकों में हैं। देश के बड़े शहरों के आलीशान फ्लैटों में उनकी पत्नियां या उनकी सखियां आराम फरमाती हैं, या पूंजीवादी अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोपीय देशों में रहकर ‘भारत के वर्ग संघर्ष’ के रसीले उत्पाद का मजा लेती हैं। यह आरोप नहीं, यह नक्सलियों की भ्रांति-क्रांति का सच है। इसका पता लगाना बहुत आसान है, लेकिन सत्ता-सियासतदानों की इसमें रुचि नहीं क्योंकि ये सब एक ही थैली के चट्‌टे-बट्‌टे हैं। नक्सली नेता जंगल में रहने वाले भोले-भाले लोगों को उसी तरह बेवकूफ बना रहे हैं जिस तरह नेता पूरे देश को।

नेताओं के कारण ही सेना और अर्ध सैनिक बलों की गंभीरता और उसकी आग्नेयता क्षीण होती जा रही है। सिविल पुलिस के बजाय हर बात में सेना का इस्तेमाल... वह दिन दूर नहीं जब यह इस्तेमाल उल्टा पड़ जाए। यह शुरू भी हो चुका, तभी तो नक्सली एक तरफ अर्ध सैनिक बलों का सामूहिक कत्लेआम करते हैं और दूसरी तरफ सरकार को युद्ध-विराम का प्रस्ताव भी देते हैं... और केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर विचार करने का संकेत देती है... यह क्या है..? अपनी ही करतूतें पलटवार कर रही हैं कि नहीं..?

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) March 06, 2010 Issue under regular column – अंत-अनंत)


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