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| मेहमान खिलाड़ियों पर हमले का धर्म... |
श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर गोलियां दागने वाले जांबाज जेहादियों के खिलाफ जब शाम तक दुनिया के किसी भी हिस्से से किसी भी इस्लामी धर्मगुरू का कोई फतवा नहीं आया तो हमारे सहकर्मी पत्रकार साथी का वह सवाल मस्तिष्क में फिर बम की तरह फटा कि कौन कहता है कि धर्म किसी व्यक्ति या किसी समुदाय के चरित्र और उसके आचरण पर असर नहीं डालता? साथी के इस सवाल का संशोधन करते हुए भी जवाब पाने के बजाय प्रतिप्रश्न ही कौंधता है कि इस्लाम को मानने वाले लोग इस्लाम के नाम पर ही हो रहे बुद्धिहीन कृत्यों के खिलाफ उठ खड़े क्यों नहीं हो रहे? या तो उन्हें धर्म का अफीम खिला खिला कायर बना दिया गया है, या इस्लाम के नाम पर हो रही अधार्मिक हिंसा को वे मौन सहमति देकर उसमें शामिल हैं। ये दो ही तो बातें हो सकती हैं? या कोई तीसरा तर्क-मार्ग भी है? या बचाव का कोई अन्य रास्ता? धर्म के नाम पर लगातार बढ़ रही बुद्धिशून्यता, संवेदनशून्यता और दिशाशून्यता को नए सिरे से कहने या नए सिरे से समझने की जरूरत नहीं है। पूरा का पूरा समुदाय धर्म की बेजा व्याख्या करने वाले अवांछित लोगों के समक्ष कितना पंगु होकर रह जाता है, कितना कायर और छद्मी बन जाता है, इसे फिर से कहने समझने की भी जरूरत नहीं। ईमानदार बात क्या है? यदि हमारा धर्म या हमारा समाज हमें हिंसा की तरफ, पाप की तरफ, चरित्रहीनता की तरफ उन्मुख करे तो ऐसे हजार धर्म और समाज को हम लानत भेजने का नैतिक बल रखें। जो धर्म हमें पाप और पुण्य की उल्टी परिभाषा रटाए, जो धर्म के नाम पर मार-काट मचा कर अपने धर्म का अधर्मी साम्राज्य स्थापित करने का पागल-स्वप्न देखे... ऐसे हजार धर्म और समाज को लानत। ...और लानत भेजने पर कोई धर्मभू फतवा जारी करे या मौत का परवाना जारी करे तो सवाल उठेगा ही कि ये धार्मिक हैं या अपराधी गिरोहों के सरगना ! ऐसे धामर्कि अहमकों के खिलाफ हम अब नहीं खड़े होंगे तो कब? लेकिन ऐसा कहने करने के लिए खुली आंख और खुले हृदय का होना जरूरी है। ट्रेनों पर लद कर दिल्ली या लखनऊ पहुंच जाने और लोकतंत्र की खाल ओढ़ कर नेताओं को डराने और तांडव करने से न खुली आंख का प्रमाण मिलता है न खुले हृदय का। मुंबई हादसा हो या पाकिस्तान में क्रिकेट खिलाड़ियों पर किया गया बेवकूफाना हमला, इस्लाम के ठेकेदार बने धर्मगुरूओं की तरफ से ऐसा कोई फतवा या बयान नहीं आया जो हमलावरों के प्रति समुदाय को घृणा बरतने और उनके सम्पूर्ण बहिष्कार का संदेश-निर्देश देता हो। ऐसी घटनाएं कितना विचलित करती हैं! क्या आपको परेशान नहीं करतीं? अगर नहीं तो आप लाश हो चुके हैं। अपने बारे में, अपने समाज के बारे में, अपने धर्म के बारे में जरूर सोचें, अगर सोचने की शक्ति बाकी रह गई हो तो। क्या इस्लाम ऐसे ही लोगों और कृत्यों से जाना जाएगा? दुनियाभर में इस्लाम धर्म के प्रति जो अविश्वास का माहौल प्रगाढ़ होता जा रहा है इसके प्रतिकार में कोई तो आगे बढ़े... जवाब दे...! हमला मुंबई में हो या पाकिस्तान में... ऐसे तमाम हमलों की वजह पर जो समान रूप से 'क्या क्यों और कौन’ चस्पा है, उसका हल और हिसाब तो ढूंढ़ना ही होगा न, अगर इस्लाम आतंक का धर्म नहीं है तो...
Published in Daily News Activist on Wednesday March 04, 2009
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट
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