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| कभी नहीं मरूंगा मैं |
एक ऐसा शख्स जिसने न केवल इतिहास बदला बल्कि भूगोल भी बदल डाला। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने दुनिया के फलक पर भारत की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित किया। एक ऐसा महायोद्धा जिसने युद्ध के खौफ की परिभाषा बदल डाली। एक ऐसा सेनापति जिसने दुश्मन सेना के सेनापति और उसके एक लाख सैनिकों को घुटने टेकने की विवशता का इतिहास लिख डाला। ऐसे शाश्वत योद्धा की अंतिम दैहिक यात्रा में सत्ता का भोग लगाने वाले सियासतदानों को शरीक होने की फुर्सत नहीं मिली।
मान और अपमान हमें, सब दौर लगे पागलपन के कांटे फूल मिले जितने भी, स्वीकारे पूरे मन से इस दुनिया में कोई न रहा, सब नामी और अनाम गए पता नहीं सब कहां गए, कुछ सुबह गए कुछ शाम गए...
सैन्य मान्यताओं के मुताबिक योद्धा न कभी रिटायर होता है, न कभी मरता है। फील्ड मार्शल एसएचएफजे मानेक शॉ भी सैन्य इतिहास में शाश्वत योद्धा के बतौर सम्मानित होते रहेंगे। लेकिन इस योद्धा की आखिरी दैहिक यात्रा में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री या अन्य कोई केंद्रीय काबीना मंत्री तो छोड़िए, रक्षा सचिव और सेना अध्यक्ष तक शरीक नहीं हुए। फील्ड मार्शल के अंतिम संस्कार के वक्त तीनों रक्षा सेवाओं के प्रमुखों का मौजूद रहना 'प्रोटोकॉलिक अनिवार्यता है। लेकिन अफसोस, फील्ड मार्शल मानेक शॉ की अंतिम यात्रा में केवल रक्षा राज्य मंत्री पल्लम राजू उपस्थित थे। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री, कोई मंत्री या मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि भी शामिल नहीं हुए। केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटोनी दिल्ली में राजनीति की लुंगी संभालते रहे और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करूणानिधि राजनीतिक अंधत्व को काले चश्मे से ढंकते-झांपते रह गए। देश का गौरवशाली इतिहास लिखने और दुनिया का मानचित्र बदल डालने वाले फील्ड मार्शल का यह सम्मान था या अपमान? दुनिया के देशों में इस अपमान का जो संदेश गया, उसने भारत को दोयम नस्ल के राजनीतिकों वाला देश ही माना।
फील्ड मार्शल मानेक शॉ के दिवंगत होने पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का ठंडा रूटीन बयान जारी हो गया। केंद्र में सत्ता संभालने वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी या केंद्र सरकार के साथ गलबहियां डाले वामपंथी दलों के नेताओं को संवेदना जताने की फुर्सत नहीं थी। इन्हें दुकानदारी से फुर्सत तो मिले! अब तो लोकसभा चुनाव में इन्हें सामान बेचने हैं, इसमें कौन फील्ड मार्शल और कौन शहीद? ये सब राजनीतिकों के हाथों अपने-अपने समय के मुताबिक बेचे जाते हैं। खरीदने-बेचने की प्रक्रिया देश में इतनी घनी हो गई है कि हमें अपने महापुरूषों के बारे में भी कोई ध्यान नहीं रहा। महापुरूषों के बाद अब बारी मां-बाप को अपमानित करने और उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं होने की है। भारतीय समाज को राजनीतिकों ने इसी जघन्य स्थिति पर ला कर खड़ा कर किया है।
यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि दो कौड़ी का एक नेता मरता है तो राजकीय-राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा होती है। सरकारी भवनों पर झंडे झुका दिए जाते हैं। विडम्बना देखिए, जो व्यक्ति राष्ट्र को बेच खाने और उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता उसके मरने पर राष्ट्रीय झंडा झुका दिया जाता है और जो व्यक्ति राष्ट्र का सम्मान और गौरव कायम रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता, सिर कटा देने तक के लिए उद्धत रहता है, उसके दिवंगत होने पर केंद्र सरकार यह भी भूल जाती है कि सेना के तीनों अंगों के मुख्यालयों पर ही कम से कम झंडे झुका दिए जाएं। किसी को याद ही नहीं आई। देर शाम को किसी ने सुध ली तो सेना मुख्यालय पर राष्ट्रीय झंडा झुका।
एक बार का आपको संस्मरण बताऊं। अधिक दिन पहले की बात नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। उन दिनों गुजरात में भूकंप की त्रासदी थी। सरकारी तौर पर हजारों और गैर सरकारी तौर पर एक लाख लोग मारे गए थे। अधिकांश बच्चे मरे थे। गणतंत्र दिवस मनाने आए बच्चे स्कूल की छतों के नीचे दब कर मर गए थे, लेकिन भारतीय गणतंत्र को यह सुध नहीं आई कि राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाए। राष्ट्र के हजारों भविष्य जिंदा दफ्न हो गए, लेकिन झंडा नहीं झुका। तब श्री वाजपेयी एक कम्पनी [जो बाद में जबरदस्त जालसाज कंपनी साबित हुई] के उद्घाटन समारोह में लखनऊ आए थे। उसी दिन अपराहन राजभवन में संवाददाता सम्मेलन आयोजित था। राजभवन का सभागार ठसाठस भरा था। अटल जी अपनी पार्टी के वरिष्ठ साथियों के साथ अवतरित हुए। मीडिया की तरफ से विद्वत सवालों की श्रृंखला शुरू हुई। किसी को भूकम्प के बारे में पूछने की सामान्य जिज्ञासा भी नहीं थी। इस संवाददाता ने साहस करके प्रधानमंत्री से पूछा, 'गुजरात भूकम्प में करीब एक लाख लोग मरे। हजारों बच्चे मर गए। क्या इतना काफी नहीं था कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय शोक घोषित करती और देश का झंडा कम से कम एक दिन के लिए झुका दिया जाता? आम मीडियाई स्वभाव और चरित्र की तरह कुछ खास मीडिया साथियों ने इस सवाल को मजाक में उड़ाने की कोशिश की, कि जैसे किसी बेवकूफ ने विद्वानों के बीच कोई अटपटा सवाल कर दिया हो। देखादेखी अटल जी ने भी अपने चिरपरिचित हास के अंदाज में कहा, 'आपसे मुलाकात नहीं हुई, नहीं तो राष्ट्रीय शोक की घोषणा तो हो ही जाती। इस जवाब पर जब उनसे कहा गया कि देश के इतने नागरिकों की दुखद मौत को हास्य में नहीं लिया जाना चाहिए, तब अटल जी अचानक गम्भीर हुए और कहा, 'चूक हो गई। गुजरात की त्रासद मौत पर राष्ट्रीय शोक की घोषणा के बारे में पूछा गया सवाल कोई व्यक्तिगत सवाल थोड़े ही था! लेकिन हमने अपने इतने छोटे-छोटे हित-लक्ष्य बना रखे हैं कि सरोकार से जुड़े सवाल भी अपने दरकार के नहीं लगते। लिहाजा, उस दिन किसी भी अखबार ने राष्ट्रीय शोक के उस सवाल और देश के प्रधानमंत्री की इतनी बड़ी सार्वजनिक स्वीकारोक्ति पर एक लाइन नहीं लिखी। समाचार लिखने में हम यह थोड़े ही देखते हैं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया सवाल किस व्यक्ति का है। सवाल अगर महत्वपूर्ण है तो वह खबर बननी चाहिए चाहे उसे किसी भी पत्रकार बंधु ने पूछा हो!
यह एक उदाहरण नेताओं के साथ-साथ मीडिया की प्राथमिकताओं की गंदी तस्वीर दिखाता है। जिन अहम मसलों पर देश के राजनीतिक शातिराना तरीके से उपेक्षापूर्ण रवैया अख्तियार करते हैं, मीडिया को उसे मुद्दा बनाना चाहिए, तब तक जब तक नेताओं को एहसास न करा दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसके ठीक उल्टा ही होता है। फील्ड मार्शल की निर्वाण यात्रा में कौन नेता आया और कौन नहीं आया, इससे मानेक शॉ के विशाल व्यक्तित्व और उनके आलीशान कृतित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन देश की सत्ता सम्भालने वाली राजनीतिक जमात अगर ऐसे व्यक्तित्वों की सम्मान-स्थापना के प्रति गंभीर नहीं है तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है और यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर नकारात्मक असर डाल रही है।
फील्ड मार्शल मानेक शॉ जैसा अभूतपूर्व व्यक्तित्व आखिरी यात्रा पर हो और नेता यह सोचे कि पाकिस्तान को तोड़ने वाले सेनापति की अंतिम यात्रा में शामिल होने से मुस्लिम मतदाता नाराज हो सकता है... तो यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े एक वरिष्ठ नेता ने जब यह कहा तो जैसे धरती ही खिसक गई। ये नेता मुस्लिमों को आखिर समझते क्या हैं? क्या उन्हें राष्ट्रीय नहीं मानते? उन्हें सिर्फ वोटर मानते हैं? क्या देश का मुस्लिम नागरिक फील्ड मार्शल मानेक शॉ को सम्मान नहीं देता? क्या भारत का मुस्लिम पाकिस्तान परस्त है? क्या इसी तुष्टिकरण की वजह से केंद्र सरकार ने तीनों सेनाध्यक्षों या अन्य किसी वरिष्ठ अधिकारी को फील्ड मार्शल की अंत्येष्टि में नहीं भेजा? इन सवालों ने अचानक केंद्र में सरकार चलाने वाली राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को घेरे में लिया है। फील्ड मार्शल मानेक शॉ की अंत्येष्टि में शामिल नहीं होने के पीछे की वजहों को कांग्रेस को देश के सामने साफ करना चाहिए। बहानेबाजी या सियासी लफ्फाजी से काम नहीं चलने वाला। अगर चूक हो गई है तो कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी अटल बिहारी वाजपेयी की तरह देश के सामने यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए, 'चूक हो गई।... और मीडिया को इसे प्रमुखता से छापना चाहिए। यह देश का मसला है किसी व्यक्ति विशेष का नहीं। हमें अपने धर्म के पालन में कोई चूक नहीं करनी चाहिए।
देह छोड़ कर जा चुके महापुरूषों का व्यक्तित्व इस बात के लिए मोहताज नहीं होता कि उसके अंतिम संस्कार में कौन बड़ा आया कि कौन छोटा। वह तो अपना काम कर जा चुका। काम तो अब हमें करना है... दायित्व तो अब हम
सबको निभाना है... इस हौसले के साथ कि... चलाओ मुझ पर गोलियां, जलाओ मेरा आशियां अभी नहीं मरूंगा मैं, कभी नहीं मरूंगा मैं...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट
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