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बुतों के आगे नतमस्तक जिंदा कौमें

उत्तर प्रदेश में मायावती के बुतों और स्मारकों का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के कारण मायावती को मिली कई न्यायिक सुविधाओं-संरक्षण की 'समृद्ध' पृष्ठभूमि के बरक्स बुतों-स्मारकों के प्रसंग में सख्त रवैया अख्तियार कर न्यायिक-उम्मीदों में फिर से थोड़ी सी जान फूंकी है... लखनऊ में जिस दिन मायावती ने अपनी ही मूर्ति का अनावरण किया था और बाबा अंबेडकर के बारे में विवादास्पद बयान दिया था, यह लेख 'बुतों के आगे नतमस्तक कौमें' लिखा गया था। दूसरे सभी अखबारों और टीवी वालों ने इस पर मौन साध कर नतमस्तक कौमों की फेहरिस्त में शामिल होने की जैसे मौन स्वीकृति दे दी थी... वही लेख एक बार फिर हम वेबसाइट के जरिए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं...

लोक कथाओं में एक सियासी-दिमाग कंजूस का जिक्र आता है जिसने अपने कृत्य से नस्लों को सीख दी थी कि मुफ्त की लकड़ी मिले तो जीते जी अपनी चिता आप सजा लो। हास्य में कही जाने वाली ऐसी लोक कथाएं आज यथार्थ में घटने लगीं और हमारे आपके दुखद संस्मरण का हिस्सा बनने लगी हैं। सत्ता की ताकत के बूते सत्ताधारिणी जीते जी अपनी ही मूर्ति खुद स्थापित कर उसका अनावरण कर ले, ऐसी घटना आधुनिक राजनीतिक इतिहास की पहली घटना है। भारत की लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में आज का अध्याय आने वाली पीढ़ियों को अजीबोगरीब मनोवैज्ञानिक गुत्थियों से भरे अलोकतांत्रिक कृत्य की याद दिलाता रहेगा। यह उस जैसा भी होगा कि मुहम्मद बिन तुगलक के चमड़े के सिक्के की याद दिलाए और उस जैसा भी कि मिस्त्र के राजे रजवाड़े सत्ता-स्वर्ण-समृद्धि में लिपटी अपनी ममियों को पिरामिड के अंदर रखे जाने की व्यवस्था अपने जीते जी ही करा लेते थे।

मूर्ति प्रेमी अंग्रेजों के शासन के कालखंड में भी झांकें तो किसी ने अपनी प्रतिमा जीते जी स्थापित कराई हो, ऐसा प्रतिमान नहीं मिलता। मुगलकाल में अकबर ने खुद अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सिकंदरा में खानदानी मकबरे का बंदोबस्त किया था, वह भी आगरा शहर से काफी दूर। महबूबा के लिए सफेद संगमरमर का मकबरा बनाने वाले शाहजहां ने भी खुद के लिए काले पत्थर का मकबरा बनाने की कोशिश की थी। मध्यकाल में अपनी स्मृतियां जबरन बनाए रखने की ऐसी कई कोशिशें हुईं। लेकिन ये सारी व्यवस्थाएं मृत्यु बाद के लिए की गई थीं, जीवनकाल के लिए नहीं। आज लखनऊ में फिरते हुए संजीदा लोगों ने एक बार फिर से एक नए किस्म के मध्यकाल की यात्रा की यंत्रणा भोगी।

प्रदेश की मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती की प्रतिमा केवल गोमती नगर में ही नहीं स्मृति उपवन में भी लगी है। स्मृति उपवन में 11 मूर्तियां लगी हैं। बात मुख्यमंत्री की एक या दो प्रतिमा की नहीं है, बात मूर्तियों की संख्या की भी नहीं है... बात भारतीय लोकतंत्र की नसों में ‘इन्जेक्ट’ होते प्रदूषित विचार-रक्त की है। बात गुत्थियों में उलझी मनोदशा के खतरनाक संकेत समझने की है। जिंदगी से हार चुकी नस्लें पत्थर की प्रतिमाओं के आगे आत्मसमर्पण कर देती हैं। नत मस्तक हो जाती हैं। प्रतिमाएं पूजती हैं, क्योंकि जीवित समाज में नायक तलाशने या जीवित समाज का नायक बनने का उनका माद्‌दा नहीं रह जाता। फिर एक दिन वह खुद मरे हुए लोगों के बुतों के बीच जाकर खड़ा हो जाता है और उनके साथ खुद को भी पुजवाना चाहता है।

महापुरुषों का, अपने पुरखों का सम्मान आवश्यक है। पुरखों की सीख और उनके योगदान हमें जीवित और जीवंत रहने के संस्कार देते हैं। लेकिन हम उनके पिंड के चक्कर थोड़े ही काटेंगे! देश, प्रदेश, विकास और विचार की धारा को बुतों तक केंद्रित थोड़े ही कर देंगे! पर, लखनऊ से इसकी शुरुआत हो चुकी है, और यह एक खतरनाक संकेत है। यदि हम सही मायने में जीवित हैं तो हमारे प्रतिमान भी जीवन से लबालब होंगे। मृत्यु पूजक संकेतों के समर्थन के समवेत स्वर नहीं गूंजेंगे।

आज राजधानी लखनऊ में प्रतिमाओं के अनावरण के सत्ताई समर्थन और संयोजन की स्थापना का दिन था। जैसे राजा नंद का दरबार आज एकबारगी राजपथ पर निकल आया हो। मिठाइयां ऐसे बांटी जा रही थीं, जैसे महंगाई और भुखमरी देखते हुए सरकार ने सरकारी खजाना खोल दिया हो। एक डिब्बे में नौ-नौ लड्‌डू। सरकारी प्रचार का बाजा पार्टी के भोंपू की तरह बज रहा था। जिधर देखें भांड ही भांड। मुंह में लड्‌डू खोंसते और मन में किस्म किस्म के ईनाम पाने के लड्‌डू फोड़ते।

सत्ता के साथ हर पल खींसें निपोरने और दिग्भ्रमित करने वाले सुझाव देने में माहिर शीर्ष नौकरशाह अपना धर्म पूर्ववत निभाते मिले-दिखे। इसके अलावा सरकार का कोई अधिकारी कर्मचारी ऐसा नहीं था जिसे इस अनावरण-आयोजन में शरीक रहने का निर्देश न मिला हो। यहां तक कि साढ़े तीन सौ सरकारी वकीलों की जमात भी अपने महाधिवक्ता के साथ कतार लगाए खड़ी थी। सरकारी वकील सरकारी कर्मचारी नहीं होते। इस और ऐसे तमाम बुद्धिजीवी समुदायों की मर्यादा की हिफाजत तो तभी हो सकेगी, जब लोकतंत्र हिफाजत से रह पाएगा! लोकतंत्र बुतों के आगे आत्मसमर्पित हो जाएगा तो फिर बचेगा क्या...

बाबा साहब का मान रखा या...

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का सम्मान बढ़ाया या उन्हें अंग्रेजों का पिट्‌ठू साबित किया? मायावती के बयान ने अंबेडकर को विवादास्पद बहस की आग में झोंक दिया है। सामाजिक परिवर्तन स्थल का उद्‌घाटन करते हुए मुख्यमंत्री मायावती बोल गईं कि कांग्रेस बाबा साहब को संविधान सभा में शामिल नहीं करना चाहती थी इसलिए साजिश करके उनके निर्वाचन क्षेत्र को पाकिस्तान के हिस्से में डाल दिया। इस पर अम्बेडकर अंग्रेजों की शरण में चले गए। अंग्रेजों से हस्तक्षेप करने का आवेदन किया। अंग्रेजों ने हस्तक्षेप किया तब जाकर वे पूना से निर्वाचित होकर संविधान सभा में शरीक हुए। अब देश के इतिहासकार इतिहास की वह किताब तलाश रहे हैं जिसे केवल मायावती ने पढ़ा। ...और वे मायावती के बयान के मद्‌देनजर अम्बेडकर और अंग्रेजों के रिश्ते की गहराई भी माप रहे हैं। मायावती के बयान से वाकई यह सवाल तो देश के सामने आया ही कि क्या अम्बेडकर को देश के किसी भी नेता पर भरोसा नहीं था कि वे सीधे अंग्रेजों की शरण में चले गए? या कि देश के नेताओं से अधिक अंतरंग सम्बंध उनके अंग्रेजों से थे?


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