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वह आवाज और आज के रीढ़हीन संपादकों की म्याऊं म्याऊं...

...अभी नहीं मरूंगा मैं, कभी नहीं मरूंगा मैं... फील्ड मार्शल मानिक शॉ के निधन पर लेख लिखते समय नीरज की कविता की यह पंक्ति याद आ गई थी। पत्रकारीय विधा के योद्धा आदरणीय प्रभाष जोशी जी के दिवंगत होने पर आज उन्हीं पंक्तियों से शुरुआत करता हुआ लिख रहा हूं... 'मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा'... और तेरा ही तुझको सौंप रहा हूं...


अग्रज आलोक तोमर जी और अनुज यशंवत जी के अनुभव और संस्मरणों ने जिंदगी के कैनवस पर बनते मिटते अनगिनत स्मृति रंगों को एक बार फिर जैसे साकार कर दिया हो।


1989 की बात है। मैं दिल्ली आया था। जोशी जी से मिलने जनसत्ता दफ्तर गया। तब इंडियन एक्सप्रेस का दफ्तर बहादुर शाह जफर मार्ग पर हुआ करता था। उस समय जोशी जी के स्टेनो कोई रामबाबू जी हुआ करते थे... तो रामबाबू जी ने मुझे उनके कक्ष में जाने से रोक दिया और कहा कि जोशी जी व्यस्त हैं। मैं सामने बैठा ऊबता रहा। इस बीच मैं हर दस पंद्रह मिनट पर रामबाबू के पास जाकर खड़ा हो जाता और वही डायलॉग सुनता, जोशी जी व्यस्त हैं, क्या टाइम लिया था..? घंटे भर से ज्यादा हो गया। अब रामबाबू से वही संवाद सुनना मुझे गवारा नहीं था और मैं धड़धड़ाता हुआ अंदर... और घबराए से रामबाबू भी अंदर...। अंदर कक्ष में तो अंधेरा था पर टेबुल लैंप जल रहा था। जोशी जी चश्मा लगाए कुछ लिखने में मगन थे। अचानक धड़ाम मचने पर उन्होंने मेरी तरफ देखा और मैंने फौरन दागा... यह व्यक्ति एक घंटे से मुझे अंदर नहीं आने दे रहा है... प्रभाष जी ने मुझे सामने कुर्सी पर बैठने का संकेत दिया और कहा, 'मैं विशेष संपादकीय लिख रहा हूं, राम बाबू जी को मैंने ही कहा था कि अभी मुझे कोई डिस्टर्ब न करे'...। मैंने उन्हें डिस्टर्ब कर दिया था लेकिन जोशी जी का विशाल व्यक्तित्व और उनकी सदाशयता... लगा कुछ हुआ ही नहीं। तब उन्होंने मुझसे पूछा था कि कलकत्ता जाएंगे जनसता में? मैंने हामी भरी और बात आई गई हो गई।


कलकत्ता से जनसत्ता लॉन्च होने की तैयारी में था। मैं भी चुना गया था। वहां ताज बंगाल होटल में इंटरव्यू चल रहा था। देश भर से पत्रकार जुटे थे। मेरी बारी आई। सवाल जवाब हुए। मैंने कतरनों और प्रमाण पत्रों का पुलिंदा भी उनके सामने खोल दिया था। प्रभाष जी कतरनें भी देखते जाते और सवाल भी करते और पैनी आंखों से मेरी आंखों के अंदर उतर कर थाह लेने की कोशिश करते भी दिखते। अचानक उन्होंने बात बंद की और कहा, 'तो प्रभात जी, परसों आप यहां डेस्क पर ज्वाइन कर लें।' उनकी बात के बीच ही मैं उठ कर सामने टेबुल पर बिखरे पड़े अपने कागजात समेटने और बैग में बेतरतीबी से ठूंसने लगा था। जोशी जी ने चश्मे के ऊपर से झांका और पूछा 'क्या हुआ...?' मैंने उनसे कहा कि डेस्क पर ज्वाइन करने से तो अच्छा है कि मैं कॉलेज में लेक्चरर ही रहूं। लेक्चरशिप छोड़ कर पत्रकारिता में इसीलिए आया था कि मुझे रिपोर्टिंग करनी थी। पाटलीपुत्र टाइम्स और आज अखबार में पिछले पांच-छह सालों से धुआंधार रिपोर्टिंग करने के बाद मुझे डेस्क पर नहीं बैठना। प्रभाष जी ने एक उंगली से मुझे बैठने का आदेशात्मक इशारा किया और पूछा, 'कैसे कर पाओगे कलकत्ता जैसे विशाल महानगर में रिपोर्टिंग? भाषा अलग, संस्कृति अलग। रिपोर्टिंग में तो बहुत मुश्किल होगी!' ...और मेरे एक जवाब ने सारी मुश्किलें आसान कर दीं। मैंने कहा कि दूर देश के रिपोर्टर कैसे करते हैं ईरान इराक जाकर रिपोर्टिंग! तमाशा घुस कर देखने का जज्बा और माद्दा होना चाहिए बस। प्रभाष जी ने उसी वक्त रिपोर्टिंग में मेरे चयन और कलकत्ता महानगर में मुझसे ही क्राइम रिपोर्टिंग कराने की घोषणा कर दी और कहा कि कल एपॉएंटमेंट लेटर ले लें। मैंने जोशी जी से कहा कि कल मेरे पिता की पुण्यतिथि है, रात को ही ट्रेन से वापस जाना है। पर साथ में नियुक्ति पत्र भी ले जाना है। प्रभाष जी ने बड़े वात्सल्य से कहा कि इंटरव्यू समाप्त होने के बाद ऊपर होटल के कमरे से लेटर ले लेना। मैं अपने हाथ से लिख कर नियुक्ति पत्र दूंगा। शाम का सात बज चुका था। ऊपर होटल के उनके कमरे में भी इंटरव्यू का दौर चल रहा था। नौ बजे मेरी ट्रेन थी। कुछ देर बाद मैं फिर उनके कमरे में वैसे ही दाखिल हुआ जैसे दिल्ली में उनके कक्ष में घुसा था। अंदर इंटरव्यू चल रहा था। शायद तब सुमंत भट्टाचार्य का इंटरव्यू चल रहा था। जनसत्ता कलकत्ता के होने वाले समाचार संपादक अमित प्रकाश सिंह भी अंदर ही थे। प्रभाष जी से मैंने कहा कि मेरी तो ट्रेन है नौ बजे और मुझे लेटर चाहिए। जोशी जी इंटरव्यू छोड़ कर सादा कागज खोजने लगे। उन्होंने कहा कि कागज तो है ही नहीं... मैंने कहा कि वो तो है टेबुल पर पड़ा हुआ...। जोशी जी ने कहा, 'अरे यार वो ताज होटल का लेटर हेड है...।' मैंने कहा कि उसी पर लिख दीजिए... और जोशी जी ताज होटल के लेटर हेड पर मेरा नियुक्ति पत्र लिखने लगे थे। प्रभाष जोशी ने होटल ताज के लेटर हेड पर मेरा नियुक्ति पत्र लिखा और आप महसूस करें कि उस समय पूरे माहौल में खुद प्रकृति जैसे यह साबित कर रही हो कि प्रभाष जी एक व्यक्ति नहीं पूरी संस्था और एक सम्पूर्ण संगठन हैं।


कई बार ऐसा होता था जब राजनीतिक या सामाजिक सरोकारों के मसले पर मेरा गुस्सा झलकता और जोशी जी मुझे प्यार से नक्सली कहते... और मेरे रिऐक्ट करने पर यह भी कहते कि नक्सली एक स्वभाव है... एक शाम अहिरी टोला स्थित जनसत्ता के दफ्तर के सामने प्रभाष जी की कार आकर रुकी। मैं भी रिपोर्टिंग से लौटा था। जोशी जी को आते देख कर रुका। जोशी जी कार से उतरे। उनकी निगाह मुझ कर पड़ी और बोल पड़े, '...और नक्सली..!' कहते हुए उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बतियाते हुए चले। सामने गलियारे के अंदर मंदिर के चबूतरे पर इंडियन एक्सप्रेस समूह के चेयरमैन विवेक गोयनका और उनके भाई मनोज सोंथालिया (जो बाद में साउथ इंडियन एक्सप्रेस के चेयरमैन बने) बैठे थे। जोशी जी ने उनकी तरफ देखा भी नहीं, लेकिन मैंने देखा कि दोनों ऐसे उठ खड़े हुए जैसे वे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक नहीं, मुलाजिम हों। जोशी जी को उन दोनों ने नमस्कार किया। जोशी जी ने सिर हिलाया लेकिन सीढिय़ों पर चढ़ते हुए भी मेरे कंधे से हाथ नहीं हटाया और बातें करते हुए ही ऊपर दफ्तर तक आए। उस दिन भी और ऐसा जाने कितनी बार स्थापित होता रहा कि संपादक के व्यक्तित्व के सामने अखबार का मालिक कहीं ठहरता नहीं... और मालिक भी ऐसे व्यक्तित्वों के आगे नतमस्तक होकर गौरवान्वित ही महसूस करता है। आज न उस तरह का संपादक-व्यक्तित्व है और न मीडिया संस्थानों के मालिकों का वैसा चरित्र। चरित्र के मामले में पत्रकार और मालिक दोनों अकालग्रस्त हों तो आत्मसम्मान ठहरता ही कहां है। प्रभाष जोशी जीवन में रहे तब भी एक विचार आंदोलन चलता रहा और उनके दिवंगत होने के बाद भी एक विचार आंदोलन तो चलेगा ही कि प्रभाष जोशी उस आलीशान परम्परा और व्यक्तित्व वाली विरासत के क्या आखिरी संपादक साबित होंगे... अगर हां तो क्यों..? मालिकों को क्यों पंगु संपादक ही पसंद हैं और पंगुता संपादकों का 'बेस्ट क्वालिफिकेशन' क्यों हो गई है। छद्मियों की मैं बात नहीं करता, लेकिन असलियत में जो मशाल थामे चलने, आगे बढऩे की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें ही बढ़ाना होगा यह विचार आंदोलन। शायद प्रभाष जोशी जी के लिए यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही होगा उनका क्रांतिकारी अभिवादन...।


आपको एक और वाकया सुनाऊं। उस दिन कलकत्ता से जनसत्ता की लॉन्चिंग होनी थी। प्रभाष जी खुद पहले पेज की लेआउट करा रहे थे। उनके हाथ में खबरों की ब्रोमाइड थी और वे पेज मेकअप में तल्लीन थे। तभी स्थानीय संपादक श्याम सुंदर आचार्य के कमरे का फोन घनघनाया। मैं वहीं था। मैंने फोन उठाया। उधर से कहा गया कि विवेक गोयनका प्रभाष जी से बात करना चाहते हैं। विवेक गोयनका उस समय तक इंडियन एक्सप्रेस समूह के बाकायदा चेयरमैन हो चुके थे। रामनाथ गोयनका के दिवंगत हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे। मैंने जोशी जी से जाकर कहा तो उन्होंने कहा, 'टेल हिम आई एम बिज़ी...।' मैंने फोन पर कह दिया कि अभी जोशी जी व्यस्त हैं। थोड़ी देर बाद फिर फोन आया। मैंने फिर जोशी जी से कहा और जोशी जी ने फिर वही कहा...। मैंने भी वही दोहरा दिया कि प्रभाष जी अखबार के लेआउट में व्यस्त हैं। कुछ देर बाद फिर फोन बजा। मैंने ही फोन उठाया। उधर विवेक गोयनका खुद फोन लाइन पर थे... मैंने प्रभाष जी से कहा कि विवेक गोयनका फोन लाइन पर हैं और वे आपसे बात करना चाहते हैं... अचानक जैसे ज्वालामुखी फटा... 'हू द हेल विवेक गोयनका इज़... टेल हिम आई ऐम बिज़ी'... मैंने फोन पर कुछ कहना चाहा पर उधर से ही आवाज आई... 'नो नो इट्स ओके, इट्स ओके... मैं थोड़ी देर बाद बात कर लूंगा।' फोन पर उधर सब आवाज साफ साफ गई और जोशी जी कोई दबी आवाज में चिल्लाए भी नहीं थे... उनकी वह आवाज और आज दब्बू और रीढ़हीन संपादकों की म्याऊं म्याऊं... चलना चाहिए न एक सशक्त विचार आंदोलन इस म्याऊं म्याऊं के खिलाफ..?


व्यक्ति हीन हो सकता है, भाषा हीन नहीं होती। अपनी मातृभाषा हीन समझी जाने लगे तो इससे अधिक हीन बात और क्या हो सकती है। यह सीख प्रभाष जी के साथ काम करने से और प्रगाढ़ हुई। अंग्रेजी भाषा के पत्रकारों के सामने मिमियाते हिन्दी पत्रकारों को प्रभाष जी ने खूब धिक्कारा। कलकत्ता के जनसत्ता/इंडियन एक्सप्रेस कार्यालय में आयोजित एक सभा में प्रभाष जोशी ने सुसज्जित अंग्रेजी (एडॉर्न्ड इंगलिश) में जब अपना भाषण दिया तो अंग्रेजी में तुर्रम खां समझने वाले फिनान्शियल एक्सप्रेस और इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार दम साधे हतप्रभ सुनते रहे और भाषण के बाद उनकी तालियां थम नहीं रही थीं। भाषण शुरु करने के बीच ही में जोशी जी ने मेरी तरफ देख कर चुटकी भी ली थी कि अंग्रेजी में बोलते देख कर प्रभात नाराज हो रहे होंगे... जोशी जी का निर्बाध अंग्रेजी में दिया गया भाषण इंडियन एक्सप्रेस समूह में हिन्दी पत्रकारों का आत्मसम्मान स्थापित करने वाला साबित हुआ। प्रभाष जी का दोनों भाषाओं का ज्ञान और हिन्दी का मान, केवल इंडियन एक्सप्रेस समूह ही क्या सम्पूर्ण पत्रकारिता विधा में हिन्दी पत्रकारों को वर्षों तक निर्बाध आत्मसम्मान से आप्यायित करता रहेगा।


प्रभाष जी से जुड़े संस्मरणों पर कितना भी लिखा जाए, कम ही लगता है। अखबार की लॉन्चिंग के पहले सारे पत्रकार साथियों के साथ हफ्तों बैठकर जोशी जी ने जो कुछ सिखाया, वह दीक्षा की ही तरह तो है... इसमें कोई अर्जुन बना तो कोई एकलव्य... लेकिन द्रोणाचार्य तो द्रोणाचार्य ही रहेंगे...


इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक का पद-मोह त्याग कर जनसत्ता के प्रकाशन-यज्ञ में जूझ पडऩे वाले प्रभाष जोशी की असामयिक मृत्यु अंग्रेजी अखबारों में पहले पेज की खबर नहीं बनती। ऐसे अखबारों और ऐसी पत्रकारिता को धिक्कार है। हम अखबार में, टीवी पर रंग भेद, वर्ग भेद, जाति भेद, धर्म भेद, भाषा भेद और तमाम भेदों के खिलाफ और आदर्शों पर वाक-मैथुन कर सकते हैं, लेकिन प्रभाष जी के निधन की खबर पहले पेज पर नहीं छाप सकते... अंग्रेजी पत्रकारों को महिमामंडित कर छापने-दिखाने वाले हिन्दी पत्रकार खुद को उदारवादी बता कर अपनी हीन-प्रवृत्ति को छिपाने की जो कोशिश करते हैं... आम आदमी इसे भली भांति समझता है। इसीलिए तो पत्रकारों के समक्ष साख का संकट गहराता जा रहा है... इसीलिए तो अब पत्रकारों की आडंबरी बातों की समाज में कोई क्रेडिबिलिटी नहीं रही... इसे हम कब समझेंगे..? दिवंगत प्रभाष जी को हृदय से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम आने वाली नस्लों के लिए कुछ तो ऐसा करें कि वे अपनी रीढ़ सीधी कर पत्रकारिता कर सकें और समाज को छद्म का आइना नहीं बल्कि सच का आइना दिखा सकें... तभी तो समय हमें यह कह पाएगा कि... 'हम हैं उनके साथ खड़े जो सीधी रखते अपनी रीढ'...


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